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मास्टर परिपत्र – प्राकृतिक आपदाओं से प्रभावित क्षेत्रों में बैंकों द्वारा किये जाने वाले राहत उपायों के लिए दिशानिर्देश

भारिबैं/2014-15/84
ग्राआऋवि.सं.एफएसडी..बीसी. 07/05.04.02/2014-15

1 जुलाई 2014

अध्यक्ष / प्रबंध निदेशक / मुख्य कार्यपालक अधिकारी
सभी अनुसूचित वाणिज्य बैंक (क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों को छोड़कर)

महोदय,

मास्टर परिपत्र –
प्राकृतिक आपदाओं से प्रभावित क्षेत्रों में बैंकों
द्वारा किये जाने वाले राहत उपायों के लिए दिशानिर्देश

कृपया दिनांक 01 जुलाई 2013 का हमारा मास्टर परिपत्र ग्राआऋवि. सं.पीएलएफएस.बीसी. 6/ 05.04.02/2013-14 देखें, जिसमें प्राकृतिक आपदाओं से प्रभावित क्षेत्रों में उपलब्ध कराए जाने वाले राहत उपायों से संबंधित मामलों के बारे में बैंकों को जारी दिशानिर्देश सम्मिलित किए गए थे।

उपर्युक्त विषय पर वर्तमान दिशानिर्देशों / अनुदेशों को सम्मिलित करते हुए वर्ष 2014-15 के लिए मास्टर परिपत्र तैयार किया गया है जो नीचे दिया गया है। इस मास्टर परिपत्र में संकलित किए गए परिपत्रों की सूची परिशिष्ट में दी गई है।

कृपया पावती दें।

भवदीया

( माधवी शर्मा)
मुख्य महाप्रबंधक


प्राकृतिक आपदाओं से प्रभावित क्षेत्रों में
बैंकों द्वारा राहत उपायों हेतु दिशानिर्देश

हमारे देश में किसी न किसी क्षेत्र में कुछ अन्तरालों पर लेकिन बार-बार होने वाले सूखे, बाढ़, चक्रवात, लहरों के झंझावात और अन्य प्राकृतिक आपदाओं में बड़ी संख्या में लोगों की जान जाती है तथा इससे जनमानस को आर्थिक रुप से भारी हानि होती है । इन प्राकृतिक आपदाओं से होने वाली हानि की पूर्ति के लिए बड़े पैमाने पर पुनर्वास प्रयासों की आवश्यकता होती है । वाणिज्य बैंकों और सहकारी बैंकों को सौंपी गई विकासात्मक भूमिका हेतु आर्थिक गतिविधियों के पुनर्गठन में उनके सक्रिय समर्थन की आवश्यकता है ।

2. चूंकि प्राकृतिक आपदाओं के आने का समय और स्थान तथा गंभीरता अप्रत्याशित होती है, अतः यह अत्यावश्यक है कि बैंकों के पास ऐसी घटनाओं के दौरान की जाने वाली कार्रवाई संबंधी योजनाएँ होनी चाहिए ताकि अपेक्षित राहत और सहायता तीव्र गति से तथा बिना समय गँवाए उपलब्ध कराई जा सके । वाणिज्य बैंकों की सभी शाखाओं और उनके क्षेत्रीय और आँचलिक कार्यालयों में उपलब्ध पूर्वानुमानों में स्थायी अनुदेशों का एक सैट होगा जिसमें जिला / राज्य प्राधिकरण द्वारा घोषणा किए जाने के तुरन्त बाद आपदा से प्रभावित क्षेत्रों में शाखाओं द्वारा कार्रवाई आरम्भ करने की जानकारी होगी । यह आवश्यक है कि ये अनुदेश राज्य सरकार प्राधिकरण तथा सभी जिला कलेक्टरों के पास भी उपलब्ध हों ताकि सभी संबंधितों को मालूम हो कि प्रभावित क्षेत्रों में बैंक की शाखाओं द्वारा क्या कार्रवाई की जानी है ।

3. वाणिज्य बैंकों द्वारा ऋण सहायता के प्रावधान में संक्षिप्त ब्योरा स्थिति की आवश्यकता, उनकी अपनी परिचालनगत क्षमताओं तथा उधारकर्ताओं की वास्तविक जरुरत पर निर्भर करेगा । वे इसका निर्णय जिला प्राधिकरण के परामर्श से ले सकते हैं ।

4. तथापि, प्राकृतिक आपदाओं से प्रभावित कृषकों, लघु उद्योग इकाइयों, कामगारों, छोटे व्यावसायियों तथा व्यापारिक संस्थानों को वित्तीय सहायता, उपलब्ध कराने के लिए बैंकों को एकसमान तथा संगठित कार्रवाई अवलिम्ब करने में सक्षम बनाने के उद्देश्य से निम्नलिखित दिशानिर्देशों की सिफ़ारिश की जाती हैं।

I संस्थागत व्यवस्था

क) जिला परामर्शदात्री समिति की बैठक

5. वित्तीय संस्थाओं द्वारा समन्वयन तथा अविलम्ब कार्रवाई की दृष्टि से प्रभावित जिलों की जिला परामर्शदात्री समितियों के संयोजकों को प्राकृतिक आपदा घटने के तुरन्त बाद एक बैठक आयोजित करनी चाहिए । राज्य का बड़ा भाग आपदा की चपेट में आने पर राज्य स्तरीय बैंकर समिति भी राज्य / जिला प्राधिकरण के सहयोग से तुरन्त एक बैठक का आयोजन करे । प्राकृतिक आपदा से प्रभावित व्यक्ति को दी जाने वाली सहायता राशि निर्धारित करते समय बैंक राज्य सरकार तथा / अथवा अन्य एजेंसियों से उसे दी जाने वाली सहायता / सब्सिडी का भी ध्यान रखें ।

ख) राज्य स्तरीय बैंकर्स समिति की विशेष बैठक

6. किसी प्राकृतिक आपदा घटने के तुरन्त बाद, प्रभावित क्षेत्रों में स्थिति की समीक्षा करने और बैंकों द्वारा समुचित राहत उपाय तुरन्त तैयार करने और उन्हें लागू करने के लिए राज्य स्तरीय बैंकर्स समिति की विशेष बैठक आयोजित की जाए ।

7. बैंक भी अपनी आपदा प्रबंधन व्यवस्था का प्रचार अपने हेल्पलाइन नम्बरों सहित करें । विशेष रूप से गठित कार्य -दलों अथवा राज्य स्तरीय बैंकर्स समिति की उप समिति में आरंभ किए गए राहत उपायों की आवधिक समीक्षा साप्ताहिक / पाक्षिक बैठकों में तब तक की जाए जब तक कि हालात सामान्य न हो जाएँ ।

ग) व्यवहार्य दृष्टिकोण

8. प्राकृतिक आपदा आने पर राहत उपाय करने में होनेवाले विलंब से बचने के लिए बैंकों को निदेशक मंडल के अनुमोदन से इस संबंध में उचित नीति की रुपरेखा तैयार करनी चाहिए तथा नीति नोट की एक प्रति हमारे अभिलेख के लिए भेजनी चाहिए । यह उचित होगा कि इन उपायों में लचीलापन रखा जाए ताकि वे किसी राज्य विशेष या जिला विशेष की उपयुक्त परिस्थिति से मेल खा सके तथा इससे संबंधित मानदंडों को राज्य स्तरीय बैंकर समिति / जिला परामर्शदात्री समिति, जैसा भी मामला हो, के साथ परामर्श करके निर्धारित किया जाए ।

घ) बैंकों के मंडल / आंचलिक प्रबंधकों को विवेकाधिकार

9. वाणिज्य बैंकों के मंडल प्रबंधकों / अंचल प्रबंधकों को कतिपय विवेकाधीन शक्तियाँ प्रदान की जानी चाहिए ताकि जिला /राज्य स्तरीय बैंकर समितियों द्वारा अनुमोदित कार्रवाई के लिए उन्हें अपने केंद्रीय कार्यालयों से दोबारा अनुमोदन लेने की आवश्यकता न हो । उदाहरणार्थ, ऐसी विवेकाधीन शक्तियों की आवश्यकता वित्त की मात्रा, ऋण अवधि को बढ़ाने, उधारकर्ता की कुल देयता के मद्देनजर नए ऋणों की स्वीकृति (अर्थात् पुराने ऋणों, जहाँ वित्तपोषित आस्तियाँ नष्ट हो गई हैं तथा ऐसी आस्तियों के सृजन / मरम्मत के लिए नए ऋण ), मार्जिन, प्रतिभूति इत्यादि के लिए होगी ।

ङ) हिताधिकारियों की पहचान

10. बैंक शाखाओं को संबंधित सरकारी प्राधिकरणों से अपने परिचालन क्षेत्र में प्रभावित गाँवों की सूचियाँ प्राप्त करनी चाहिए । पहचान किए गए लोगों में से बैंकों के वर्तमान घटकों द्वारा क्षति का मूल्यांकन करना आसान होगा । तथापि, नए उधारकर्ताओं के बारे में इस संबंध में जाँच अपने विवेक के आधार पर की जानी चाहिए तथा उनकी आवश्यकताओं की वास्तविकता सुनिश्चित करने के लिए सरकारी प्राधिकरणों की सहायता, जहाँ भी उपलब्ध हो, लेनी चाहिए । फसल ऋण के संबंध में परिवर्तन सुविधा उपलब्ध कराने के लिए क्षेत्रों की पहचान की प्रक्रिया, जहाँ ऐसी सुविधाएँ उपलब्ध करानी हैं, नीचे पैराग्राफ 9 में फसल ऋण के अन्तर्गत निर्दिष्ट की गई हैं ।

च) कवरेज

11. प्रत्येक शाखा न केवल वर्तमान उधारकर्ताओं को, बल्कि अपने क्षेत्र के अन्य पात्र व्यक्तियों को भी ऋण सहायता देगी, बशर्ते कि उन्होंने किसी अन्य वित्तीय एजेंसी के माध्यम से सहायता न ली हो ।

12. सहकारी समितियों के उधारकर्ता सदस्यों की ऋण आवश्यकताएं प्राथमिक कृषि सहकारी समितियां (पीएसीएस) / बड़े आकारवाली बहु उद्देशीय समितियां (एलएएमपीएस) / कृषक सेवा समितियां (एफएसएस) आदि पूरी करेंगी । तथापि, वाणिज्य बैंकों की शाखाएं सहकारी समितियों के उधार न लेनेवाले सदस्यों को वित्त प्रदान कर सकती हैं, जिसके लिए सहकारी समितियां सामान्य "अनापत्ति" प्रमाणपत्र शीघ्र जारी करेंगी ।

छ) प्राथमिकताएं

13. खड़ी फसलों / फलोद्यानों / फसलों आदि को बचाने और क्षय से रोकने के लिए वित्त उपलब्ध कराने के साथ-साथ तुरंत सहायता की आवश्यकता होगी । पशुधन शेड, अनाज और चारा रखने के भंडारण, ड्रेनेज, पंपिंग की मरम्मत और बचाव तथा पंपसेटों, मोटरों, इंजिनों और अन्य उपस्करों के मरम्मत के लिए कार्रवाई और अन्य उपाय भी उतने ही जरुरी हैं । मौसमी आवश्यकताओं के अधीन अगली फसल का वित्तपोषण किया जाए ।

II. कृषि ऋण

14. फसलें उगाने के लिए अल्पावधि ऋण (फसल ऋण) तथापि दुधारु / जुताई पशुओं की खरीद, चालू नलकूपों और पंपसेटों की मरम्मत, नए नलकूपों की खुदाई और नए पंपसेट लगाना, भूमि सुधार, सिल्ट /रेत हटाना, खड़ी फसलों /फलोद्यानों/बागानों आदि को बचाने तथा क्षय से रोकने, पशुधन शेड, अनाज और चारा रखने के भंडारघरों की मरम्मत और बचाव आदि के लिए मीयादी ऋण के रुप में कृषि के संबंध में बैंक सहायता की आवश्यकता होगी । बैंक अन्य बातों के साथ-साथ फसल की क्षति / वित्त की मात्रा और उनकी चुकौती क्षमता को ध्यान में रखते हुए प्रभावित उधारकर्ताओं को दिए जाने वाले नए ऋण की मात्रा, स्वयं निर्धारित कर सकते हैं ।

ए) फसल ऋण

क) नुकसान का पता लगाना

15. प्राकृतिक आपदाओं के मामले जैसे सूखा, बाढ़ आदि में सरकारी प्राधिकारी फसल की क्षतिग्रस्त मात्रा को दर्शाने के लिए अन्नेवारी घोषित कर सकते थे । तथापि, जहाँ ऐसी घोषणा न की गई हो, बैंकों को परिवर्तन सुविधाएँ उपलब्ध कराने में विलंब नहीं करना चाहिए तथा जिलाधीश से इस संबंध में (जिसके लिए एक विशेष बैठक का आयोजन करना पड़े) जिला परामर्शदात्री समिति के विचारों से समर्थित इस आशय का प्रमाणपत्र कि फसल की उपज सामान्य ऋण के 50% से कम है, तत्काल सहायता व्यवस्था उपलब्ध कराने के लिए पर्याप्त होगा । जिलाधीश का प्रमाणपत्र फसल-वार जारी किया जाना चाहिए जिसमें सभी फसलें, खाद्यान्न सहित, शामिल हों । नकदी फसल के संबंध में ऐसे प्रमाणपत्र जारी करना जिलाधीश के विवेक पर छोड़ सकते हैं । दूसरी ओर, प्राकृतिक आपदा जैसे सूखा, बाढ़ आदि होने पर जिला आयुक्त अग्रणी बैंक अधिकारी को डीसीसी की बैठक आयोजित करने के लिए कहे तथा डीसीसी को इस आशय की रिपोर्ट प्रस्तुत करें कि प्राकृतिक आपदा से प्रभावित क्षेत्र में फसल की हानि किस सीमा तक हुई है । डीसीसी के संतुष्ट होने पर कि प्राकृतिक आपदा से फसल की अत्यधिक हानि हुई है, बिना अन्नावारी की घोषणा के भी प्राकृतिक आपदा से प्रभावित किसानों को स्थायी दिशा-निर्देशों के अनुसार कृषि ऋणों के परिवर्तन / पुनर्गठन सहित राहत प्रदान की जाए ।

ख) नए ऋण प्रदान करना तथा वर्तमान ऋणों का पुनर्निर्धारण

16. प्राकृतिक आपदा आने पर उधारकर्ता द्वारा अपेक्षित वित्तीय सहायता में

i) उपभोग ऋण
ii) सामान्य कारोबार पुनः चालू करने हेतु नए ऋण
iii) वर्तमान ऋणों का पुनर्निर्धारण शामिल होगा ।

i) उपभोग ऋण

17. वर्तमान उधारकर्ताओं को सामान्य उपभोग प्रयोजनों के लिए बिना किसी संपार्श्विक जमानत के 10,000 रूपए तक के ऋण स्वीकृत किए जा सकते हैं। तथापि, उक्‍त सीमा को बैंक के विवेकाधिकार पर 10000/- से अधिक बढ़ाया जा सकेगा।

ii) नए ऋण

18. उत्पादक गतिविधियाँ आरंभ करने के लिए समय पर नई वित्तीय सहायता न केवल वर्तमान उधारकर्ताओं को, बल्कि अन्य पात्र उधारकर्ताओं को भी उपलब्ध कराई जाए । वर्तमान खातों की स्थिति के बावजूद उधारकर्ताओं को दिए गए नए ऋण चालू देय माने जाएंगे ।

iii) वर्तमान ऋणों का पुनर्निर्धारण

19. चूंकि प्राकृतिक आपदाओं से प्रभावित लोगों की चुकौती क्षमता आर्थिक व्यवसाय की क्षति और आर्थिक आस्तियों की हानि के कारण बुरी तरह प्रभावित हो जाती है, अतः प्राकृतिक आपदाओं से प्रभावित क्षेत्रों में यह आवश्यक हो जाता है कि ऋणों की चुकौती में राहत दी जाए। अतः वर्तमान ऋणों का पुनर्निर्धारण आवश्यक होगा । अल्पावधि ऋण के मूल धन तथा प्राकृतिक आपदा वाले वर्ष में चुकौती हेतु देय ब्याज को भी मीयादी ऋण में परिवर्तित कर दिया जाए । मीयादी ऋण के मामले में, प्राकृतिक आपदा वाले वर्ष में देय मूल धन और ब्याज की किश्तों को भी मीयादी ऋण में परिवर्तित किया जाए ।

20. मीयादी ऋणों की पुनर्निर्धारित चुकौती अवधि आपदा की गंभीरता और उसकी पुनरावृत्ति, आर्थिक आस्तियों की हानि की सीमा और विपत्ति के आधार पर अलग-अलग हो सकती है। सामान्यतया, चुकौती के लिए पुनर्निर्धारित अवधि 3 से 5 वर्ष हो सकती है । तथापि, जहाँ आपदा से हुई क्षति बहुत अधिक है, बैंक अपने विवेक के आधार पर टास्क फोर्स / एसएलबीसी के साथ परामर्श करके चुकौती की अवधि 7 वर्ष तथा अत्यधिक मुसीबत में चुकौती अवधि अधिकतम 10 वर्ष तक कर सकते हैं ।

21. पुनर्निर्धारण के सभी मामलों में अधिस्थगन अवधि कम से कम एक वर्ष होनी चाहिए। साथ ही बैंकों को ऐसे पुनर्निर्धारित ऋणों पर अतिरिक्त संपार्श्विक की मांग नहीं करनी चाहिए । पुनर्निर्धारित ऋणों के लिए आस्ति वर्गीकरण वही रहेगा जैसाकि पुनर्निर्धारित ऋणों हेतु वर्तमान दिशा-निर्देशों के अनुसार एक वर्ष की अवधि के लिए पुनर्निर्धारण करते समय था । इन ऋणों की आस्ति वर्गीकरण स्थिति निम्नानुसार होगी :

क) अल्पावधि ऋणों तथा मीयादी ऋणों जिसके पुनर्निर्धारित भाग को नए ऋणों में परिवर्तित किया गया हो, उन्हें चालू देय के रूप में माने जाएँ तथा उन्हें अनर्जक आस्तियों के रुप में वर्गीकृत करने की आवश्यकता नहीं है। इन नए मीयादी ऋणों का आस्ति वर्गीकरण इसके बाद संशोधित शर्तों से शासित होगा तथा अल्पावधि फसलों के लिए दो फसल मौसम तथा लम्बी अवधि की फसलों के लिए एक फसल मौसम के लिए मूलधन का ब्याज तथा / अथवा किस्त अतिदेय रहने पर उन्हें अनर्जक आस्ति माना जाएगा।

ख) पुनर्निर्धारित न की गई शेष देय राशि के आस्ति वर्गीकरण पर मूल शर्तें लागू होंगी । इसके फलस्वरुप, उधारदाता बैंक द्वारा उधारकर्ता से देय राशि को विभिन्न आस्ति वर्गीकरण जैसे मानक, अवमानक, संदिग्ध, हानि के अंतर्गत वर्गीकृत किया जाएगा ।

ग) अतिरिक्त वित्त, यदि कोई हो तो "मानक आस्तियां" के रूप में माना जाएगा और भविष्य में उनका आस्ति वर्गीकरण उसकी स्वीकृति की शर्तों और स्थिति से शासित होगा ।

22. प्राकृतिक आपदा से प्रभावित स्वयं सहायता समूहों को उधार देने और अन्य मानदंडों में बैंक द्वारा अपने विवेकाधिकार के अधीन छूट दी जाए । इसी प्रकार, खुदरा अथवा उपभोग ऋणों के घटक में बैंक ऋणों का पुनर्निर्धारण प्रत्येक मामले के आधार पर इस प्रकार किया जाए कि वह उधारकर्ताओं के लिए उपयुक्त हो ।

23. i) प्राकृतिक आपदा की तारीख से तीन माह की अवधि के भीतर पुनर्निर्धारण पूरा हो जाने पर प्राकृतिक आपदा की तारीख पर पुनर्निर्धारित खातों का आस्ति वर्गीकरण जारी रहेगा ।

ii) वे खाते, जो प्राकृतिक आपदाओं के कारण दूसरी बार या उससे अधिक बार पुनर्निर्धारित किए गए हों, पुनर्निर्धारण पर उसी आस्ति वर्गीकरण संवर्ग में बने रहेंगे। तदनुसार, एक बार पुनर्निर्धारित की गई मानक आस्ति को प्राकृतिक आपदा के कारण बाद में पुनर्निर्धारित किए जाने की आवश्‍यकता होने पर उसे दूसरा पुनर्निर्धारण नहीं माना जाएगा अर्थात् मानक आस्ति वर्गीकरण का स्‍तर बनाए रखने की अनुमति दी जाएगी। तथापि, अन्‍य सभी पुनर्निर्धारण मानदंड लागू होंगे।

ग) परिवर्तन सुविधाएँ उपलब्ध करवाने हेतु अन्य दिशा-निर्देश

24. i) जहां तक संभव हो, परिवर्तित ऋण और बढ़ाई गई अवधि वाले मीयादी ऋणों के भुगतान की किस्तों के लिए एक ही देय तारीख के निर्धारण को तरजीह दी जाए ।

ii) प्राकृतिक आपदाओं के समय अतिदेय ऋणों के अतिरिक्त सभी अल्पावधि ऋण परिवर्तन सुविधाओं के लिए पात्र होंगे ।

iii) अल्पावधि ऋणों को परिवर्तित करने तक, बैंक प्रभावित किसानों को नए फसल ऋण स्वीकृत कर सकते हैं ।

iv) बैंकों द्वारा प्रभावित किसानों को नए फसल ऋण स्वीकृत करते समय नियत तारीख का इन्तजार न करके, जो ऐसे ऋण स्वीकृत करते समय सामान्य रुप से किया जाता है, अल्पावधि फसल ऋण का परिवर्तन किया जाए ।

v) उसी तरह, मीयादी ऋणों के मूलधन / ब्याज की किस्तें 3 वर्ष की अवधि के लिए पुनःनिर्धारित की जाएँ जो ऊपर पैरा 15 में उल्लिखित परिस्थिति में लंबी अवधि तक बढ़ायी जा सकती हैं ।

vi) परिवर्तित ऋणों पर ब्याज दर अल्पावधि ऋणों पर प्रभारित और 'अग्रिमों पर ब्‍याज दरों' संबंधी डीबीओडी के मास्‍टर परिपत्र (2 जुलाई 2012 का डीबीओडी.सं. डीआइआर.बीसी. 5/ 13.03.00/2012-13) में निर्दिष्‍ट प्रकार से हो ।

vii) जहां किसानों को ऋणों के परिवर्तन / पुनर्निर्धारण के रूप में राहत दी जाती है, ऐसे परिवर्तित / पुनःनिर्धारित अतिदेय वर्तमान अतिदेय के रूप में माने जाएंगे और बैंकों को इस तरह परिवर्तित / पुनर्निर्धारित ऋणों के मामले में चक्रवृद्धि ब्याज नहीं लगाना चाहिए ।

घ) तत्काल राहत

25. प्रभावी होने के लिए किसानों को वित्तीय सहायता का संवितरण शीघ्रातिशीघ्र होना चाहिए । इस प्रयोजन हेतु अग्रणी बैंक तथा संबंधित जिला प्राधिकरणों को एक प्रक्रिया आरंभ करनी चाहिए, जिसमें उधारकर्ताओं की पहचान, सरकारी / सहकारी /बैंक अतिदेयों संबंधी प्रमाणपत्र का जारी करना, भूमि के लिए आवेदक का हकनामा आदि का भी साथ-साथ प्रबंध किया जाए ।

26. ऐसे स्थानों पर ऋण कैम्प लगाने की संभावनाओं का पता ऋण कैम्पों का आयोजन करने वाले प्राधिकरणों से विचार विमर्श करके लगाया जाए जहाँ ब्लॉक विकास और राजस्व अधिकारी, सहकारी निरीक्षक, पंचायत प्रधान आदि आवेदनपत्रों का निपटान उसी समय करने में सहायक हों । राज्य सरकार भी कलेक्टर से कार्यकारी आदेश जारी करने की व्यवस्था करेगी, जिससे अनुसरण करनेवाले अधिकारी या उनके प्राधिकृत प्रतिनिधि उधार कैम्प कार्यक्रम के कार्यान्वयन के अंतर्गत परिकल्पित कर्तव्य तथा जिम्मेदारियां निभा सकें ।

क) खंड विकास अधिकारी
ख) सहकारी निरीक्षक
ग) राजस्व प्राधिकारी / ग्राम राजस्व सहायक
घ) क्षेत्र में कार्यरत बैंक अधिकारी
ङ) प्राथमिक कृषि ऋण समितियां / बड़े आकार वाली बहुउद्देशीय समितियां / कृषक सेवा समितियां
च) ग्राम पंचायत प्रधान

उधार कैम्प में राज्य सरकारी अधिकारियों को जिस फार्म में प्रमाणपत्र देने हैं, वे संबंधित जिला मैजिस्ट्रेट द्वारा पर्याप्त संख्या में छपवाये जाएं ताकि इसमें विलंब न हो ।

27. आगामी फसल मौसम के लिए ऋण आवेदनों पर विचार करते समय, राज्य सरकार के प्रति आवेदक की वर्तमान देयता पर ध्यान न दिया जाए, बशर्ते राज्य सरकार प्राकृतिक आपदा की तारीख को सरकार के प्रति देय राशि पर पर्याप्त रुप से लंबी अवधि के लिए स्थगन अवधि घोषित करती है ।

ङ) वित्त का मान

28. जिले में विभिन्न फसलों का वित्तीय मान एक समान होगा । विभिन्न उधारकर्ता एजेंसियों द्वारा वर्तमान में अपनाये गये मानदंडों और प्रचलित शर्तों को ध्यान में रखकर मान निर्धारित किया जाए । मान निर्धारित करते समय, उधारकर्ता की न्यूनतम उपभोक्ता आवश्यकताओं पर विचार किया जाए । संबंधित जिला मैजिस्ट्रेटों तथा जिले में परिचालित बैंकों की शाखाओं के प्रबंधकों को ऐसे निर्धारित मान अपनाने के लिए सूचित किया जाए ।

बी) विकास ऋण - निवेश लागत

29. उधारकर्ता की चुकौती क्षमता और प्राकृतिक आपदा के स्वरुप को ध्यान में रखकर वर्तमान मीयादी ऋण किस्तों का पुनर्निर्धारण / स्थगन किया जाना चाहिए, अर्थात्

  1. सूखा, बाढ़ या चक्रवात आदि जहां उसी वर्ष में केवल फसल की क्षति हुई है और उत्पादक आस्तियों की क्षति नहीं हुई है ।
  2. बाढ़ या चक्रवात जहां उत्पादक आस्तियां अंशतः या पूर्णतः क्षतिग्रस्त हैं और उधारकर्ताओं को नए ऋण की आवश्यकता हो ।

30. श्रेणी (i) के अन्तर्गत प्राकृतिक आपदा के संबंध में बैंक निम्नलिखित अपवादों के अधीन प्राकृतिक आपदा के वर्ष के दौरान किस्तों के भुगतान को स्थगित कर सकते हैं तथा ऋण की अवधि एक वर्ष आगे बढ़ा सकते हैं :-

क) उन कृषकों को जिन्होंने वह विकास और निवेश नहीं किया है जिसके लिए ऋण लिया था अथवा ऋण की राशि से खरीदे गए औजार अथवा मशीनरी बेच दी हो;

ख) वे जो आयकर दाता हैं;

ग) सूखे की स्थिति में, नहरों से न छोड़े गए पानी की आपूर्ति के अतिरिक्त सिंचाई के बाराहमासी स्रोत हैं अथवा अन्य बाराहमासी स्रोतों से सिंचाई सुविधा उपलब्ध नहीं थी और;

घ) ट्रैक्टर मालिक, केवल वास्तविक मामलों में जहाँ आय समाप्त हो गई हो तथा उसके परिणामस्वरूप उनकी चुकौती क्षमता में कमी आई हो ।

इस व्यवस्था के अन्तर्गत, पहले के वर्षों में जानबूझकर की गई चूक वाली किस्तें पुनर्निर्धारण के लिए पात्र नहीं होंगी । उधारकर्ताओं द्वारा ब्याज की अदायगी बैंकों द्वारा स्थगित करनी पड़ सकती है । अवधि बढ़ाने का निर्धारण करते समय ब्याज की पाबन्दी को भी हिसाब में लिया जाना चाहिए ।

31. श्रेणी (ii) के संबंध में अर्थात जहाँ उधारकर्ता की आस्तियाँ पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो गई हैं, ऋण की अवधि बढ़ाकर उनका पुनर्निर्धारण उधारकर्ता की पुराने मीयादी ऋणों की चुकौती प्रतिबद्धता सहित अल्पावधि ऋणों तथा नए ऋणों की चुकौती स्थगित होने पर (मध्यम अवधि ऋण) परिवर्तित ऋण के प्रति उनकी समग्र चुकौती क्षमता के आधार पर किया जाए । ऐसे मामलों में सरकारी एजेंसियों से प्राप्त सब्सिडी, बीमा योजनाओं के अन्तर्गत उपलब्ध मुआवजा इत्यादि कम करके (ब्याज देयता सहित) कुल ऋण की चुकौती अवधि उधारकर्ता की चुकौती क्षमता के अनुसार निर्धारित की जाए जिसकी अधिकतम सीमा 15 वर्ष होगी तथा भूमि तैयार करने, सिल्ट हटाने, भूसंरक्षण इत्यादि से संबंधित ऋण के मामलों के अतिरिक्त यह निवेश के स्वरुप, वित्तपोषित नई आस्तियों की अवधि (उपयोगिता) के अधीन होगी । अतः कृषि मशीनरी यथा पम्पसैटों और ट्रैक्टरों के लिए ऋण के संबंध में यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि कुल ऋण अवधि अग्रिम की तारीख से सामान्यतया 9 वर्ष से अधिक न हो ।

32. वर्तमान मीयादी ऋणों के पुनर्निर्धारण के अतिरिक्त बैंक प्रभावित किसानों को विकासात्मक प्रयोजनों के लिए विभिन्न प्रकार के मीयादी ऋण उपलब्ध कराएंगे यथा :-

क) लघु सिंचाईः कुँओं, पम्पसेटों की मरम्मत के लिए मीयादी ऋण, जिसकी मात्रा क्षति के मूल्यांकन के बाद मरम्मत की अनुमानित लागत के आधार पर तय की जाएगी ।

ख ) बैलः जहां जुताई के लिए प्रयोग किए जाने वाले जानवर बह गए हों, बैलों / भैंसों की नई जोड़ी खरीदने के लिए नए ऋण के आवेदन पर विचार किया जा सकता है । जहाँ नए जानवर खरीदने के लिए ऋण दिया जा चुका है अथवा जहाँ किसानों ने दुधारु पशु खरीद लिए हैं, वहाँ चारा खरीदने के लिए यथोचित ऋण दिया जा सकता है ।

ग) दुधारु पशु : दुधारु पशुओं के लिए आवधिक ऋण देने के लिए जानवरों की नस्ल, दूध से प्राप्त होने वाली आय इत्यादि के आधार पर विचार किया जा सकता है । इस ऋण में छप्परों की मरम्मत, औजारों तथा चारे की खरीद के लिए भी राशि सम्मिलित होगी ।

घ) बीमा : चक्रवात तथा अन्य प्राकृतिक आपदाओं वाले क्षेत्रों में इस आशंका के मद्देनज़र जानवरों का बीमा कराया जाना चाहिए । दुधारु पशुओं और जुताई वाले जानवरों की पहचान इस रुप में की जानी चाहिए कि हिताधिकारी उन्हें बेच कर अपने हितों की रक्षा कर सकें ।

ङ) मुर्गी पालन और सुअर पालन: मुर्गी पालन, सुअर पालन तथा बकरी पालन के लिए ऋणों के लिए विभिन्न बैंकों के मानदण्डों के अनुसार विचार किया जाएगा ।

च) मत्स्यपालन : उन उधारकर्ताओं के मामले में जिनकी नाव, जाल और अन्य उपकरण नहीं रहे, उन्हें वर्तमान अतिदेय राशि के भुगतान के पुनर्निर्धारण की अनुमति उनके मामले के गुणदोषों के आधार पर की जाए । उन्हें 3-4 वर्ष की अवधि के लिए नए ऋण दिए जाएँ । वर्तमान उधारकर्ताओं की नावों की मरम्मत के लिए ऋणों पर भी विचार किया जाए । उन मामलों में, जहाँ सब्सिडी उपलब्ध है, ऋण को उस सीमा तक कम किया जाए । उन राज्यों में जहाँ नाव, जाल इत्यादि के लिए मूल सब्सिडी उपलब्ध होने वाली हो, वहाँ राज्य सरकार के विभाग के साथ उचित समन्वय सुनिश्चित किया जाना चाहिए । अग्रिम देने के लिए अन्य मानदण्डों के अनुपालन के अतिरिक्त, मत्स्य विभाग से सहायता की मांग की जाए । नावों का व्यापक रुप से जहाँ तक संभव हो प्राकृतिक आपदाओं सहित सभी जोखिमों के लिए बीमा कराना चाहिए ।

33. यह संभव है कि रेत की ढलाई वाली भूमि के सुधार के लिए वित्तीय सहायता की आवश्यकता पड़ सकती है । सामान्यतः तीन इंच तक की रेत / सिल्ट के ढेर को बिना किसी वित्तीय सहायता के या तो हल चलाकर मिट्टी में मिलाया जा सकता है अथवा किसानों द्वारा निकाला जा सकता है। तथापि, ऐसे मामलों में की ऋण के आवेदनों पर विचार किया जायेगा जहाँ तत्काल खेती करना संभव हो तथा सुधार (रेत को निकालना) आवश्यक हो। जहाँ खारी भूमि के लिए भूमि सुधार हेतु वित्त की वारंटी दी गई है , वहाँ फसल ऋण के लिए अनुमत मान के 25% से अनधिक भूमि सुधार की लागत फसल ऋण के साथ ही प्रदान की जाए।

34. अन्य कार्यकलापों जैसे कृषि, बागवानी, पुष्प-कृषि, पान के पत्तों की खेती आदि के लिए बैंक उनकी मौजूदा योजनाओं के अंतर्गत निवेश हेतु ऋण तथा कार्यशील पूंजी प्रदान करेंगे तथा स्वयं ही तैयार की गई सामान्य प्रक्रिया का पालन करेंगे । कार्यशील पूंजी वित्त उस अवधि तक उपलब्ध करवाया जाए जब तक ऐसे खर्च को संभालने के लिए फसल की आय पर्याप्त न हो ।

35. तथापि, वैयक्तिक मूल्यांकन के आधार पर खड़ी फसलों / बागों को क्षय से रोकने के लिए जरुरत पड़ने पर अतिरिक्त आवश्यकता आधारित फसल ऋण दिये जा सकते हैं ।

36. बीजों की मात्रा तथा विभिन्न प्रकार के उर्वरकों की पर्याप्त आपूर्ति की अधिप्राप्ति तथा सही व्यवस्था से संबंधित प्रश्न पर प्रत्येक जिले की राज्य सरकार तथा जिला प्रशासन के साथ विचार-विमर्श करना होगा । इसी प्रकार, पर्याप्त सिंचाई सुविधाएँ सुनिश्चित करने के लिए बाढ़ तथा अन्य प्राकृतिक आपदाओं द्वारा क्षतिग्रस्त सरकारी स्वामित्व वाले सतही तथा गहरे नल-कूपों तथा नदी उत्थान सिंचाई प्रणाली की मरम्मत राज्य सरकार द्वारा की जायेगी । मत्स्य पालन के मामले में, राज्य सरकार का मत्स्य-पालन विभाग मछलियों को प्राप्त करने की व्यवस्था करेगी तथा उसकी आपूर्ति उन लोगों को करेगा जो बैंक वित्त से टैंक मत्स्यपालन दुबारा शुरु करना चाहते हैं ।

37. राज्य सरकार ऐसी योजनाएँ तैयार करने पर विचार करेगी ताकि उक्त प्रयोजन हेतु बैंकों द्वारा प्रदान की जानेवाली राशि के लिए वाणिज्य बैंक नाबार्ड दरों पर पुनर्वित्त प्राप्त कर सकें ।

सी) शर्तें

38. राहत ऋणों को नियंत्रित करने वाली शर्तें जमानत, मार्जिन आदि के मामलों में लचीली होंगी ।

क) गारंटी

व्यक्तिगत गारंटी न होने के कारण से उधार को मना नहीं किया जाना चाहिए ।

ख) जमानत

i) जहाँ बाढ़ से हुई क्षति या विनाश के कारण बैंक की मौजूदा जमानत बह गई हो वहां-वहां सहायता केवल अतिरिक्त नई जमानत न होने के कारण अस्वीकार नहीं की जायेगी ।

जमानत (मौजूदा तथा नए ऋण से प्राप्त की जानेवाली आस्तियों) का मूल्य ऋण की राशि से कम होने पर भी नया ऋण प्रदान किया जाना चाहिए । नए ऋणों के लिए सहानुभूतिपूर्ण रूख अपनाया जाना चाहिए।

ii) जहाँ पहले व्यक्तिगत जमानत / फसल को दृष्टिबंधक रख कर फसल ऋण (जिसे मीयादी ऋण में परिवर्तित किया गया है ) प्रदान किया गया हो, तथा उधारकर्ता परिवर्तित ऋण के लिए जमानत के रूप में भूमि का प्रभार / बंधक प्रस्तुत करने में असमर्थ हो तो केवल भूमि को जमानत के रूप में प्रस्तुत करने की उनकी असमर्थता के आधार पर उन्हें परिवर्तन सुविधा से वंचित नहीं रखा जाना चाहिए। यदि उधारकर्ता भूमि पर बंधक /प्रभार के विरुद्ध पहले ही एक मीयादी ऋण ले चुका है, बैंक को परिवर्तित मीयादी ऋण के लिए द्वितीय प्रभार से संतुष्ट हो जाना चाहिए । बैंकों को परिवर्तन सुविधाएँ उपलब्ध करवाने हेतु तृतीय पक्ष की गारंटियों पर जोर नहीं देना चाहिए।

iii) औजार बदलने, मरम्मत आदि के लिए मीयादी ऋण, तथा कारीगरों और स्वनियोजित व्यक्तियों को कार्यशील पूंजी प्रदान करने या फसल ऋण के मामले में सामान्य जमानत प्राप्त की जा सकती है। जहाँ भूमि जमानत के रूप में हो, मूल स्वत्व अभिलेखों की अनुपलब्धता में उन किसानों जिनके स्वत्व अर्थात विलेख के रूप में तथा पंजीकृत बटाईदारों द्वारा जारी पंजीयन प्रमाणपत्रों के सबूत गुम हो गए हों, को वित्तपोषण करने हेतु राजस्व विभाग के प्राधिकारियों द्वारा जारी प्रमाणपत्र स्वीकार किये जा सकते हैं ।

ग) मार्जिन

39. मार्जिन अपेक्षाओं में छूट दी जाए अथवा संबंधित राज्य सरकार द्वारा प्रदान अनुदान/सब्सिडी को मार्जिन समझा जाये ।

घ) ब्याज दर

40. ब्याज की दरें भारतीय रिज़र्व बैंक के निदेशों के अनुसार होंगी। तथापि, बैंकों से अपेक्षा की जाती है कि वे उनके क्षेत्राधिकार में उधारकर्ताओं की कठिनाइयों पर उदारता का रूख अपनाएं तथा आपदा से प्रभावित लोगों के साथ सहानुभूतिपूर्वक पेश आएँ।

विभेदक ब्याज दर योजना के अंतर्गत पात्रता मानदंडों को पूरा करने वालों को योजना के प्रावधानों के अनुसार ऋण उपलब्ध कराया जाए ।

चूक वाली वर्तमान बकाया राशि के संबंध में दण्डात्मक ब्याज लगाया नहीं जायेगा । बैंकों को ब्याज प्रभारों के यौगिक होने को उपयुक्त रूप से स्थगित करना चाहिए । बैंकों को कोई दण्डात्मक ब्याज नहीं लगाना चाहिए तथा परिवर्तित / पुनर्निर्धारित ऋणों के संबंध में यदि कोई दण्डात्मक ब्याज लगाया जा चुका हो तो उसमें छूट देने पर विचार किया जाना चाहिए।

III कारीगर तथा स्वनियोजित व्यक्ति

41. हथकरघा बुनकरों सहित ग्रामीण कारीगरों तथा स्वनियोजित व्यक्तियों के सभी वर्गों के लिए शेडों की मरम्मत, औजारों की प्रतिस्थापना एवं कच्चा माल खरीदने और गोदाम के लिए ऋण की आवश्यकता होगी। ऋण स्वीकृत करते समय संबंधित राज्य सरकार द्वारा सब्सिडी/सहायता हेतु उपयुक्त भत्ता उपलब्ध कराया जायेगा।

42. ऐसे कई कारीगर, व्यापारी तथा स्वनियोजित व्यक्ति होंगे जिनके पास किसी बैंक के साथ कोई बैंकिंग व्यवस्था अथवा सुविधा न हो लेकिन अब उन्हें पुनर्वास के लिए वित्तीय सहायता की जरुरत पड़ेगी । ऐसे वर्ग बैंक शाखाओं से सहायता हेतु पात्र होगें जिनके अधिकार क्षेत्र में वे रहते हों अथवा अपना व्यवसाय / कारोबार करते हों । जहाँ ऐसे व्यक्ति / पार्टी एक से अधिक बैंक के अधिकार क्षेत्र में आते हों वहाँ संबंधित सभी बैंक मिलकर उनकी समस्या का हल निकालेंगे ।

IV लघु एवं अत्यंत लघु इकाइयाँ

43. ग्रामीण एवं कुटीर उद्योग क्षेत्र, लघु औद्योगिक इकाइयों तथा मध्यम औद्योगिक क्षेत्र की क्षतिग्रस्त छोटी इकाइयों के अंतर्गत आनेवाली इकाइयों के पुनर्वास पर ध्यान देना आवश्यक होगा । कारखानों के भवनों /शेडों और मशीनों की मरम्मत एवं नवीकरण तथा क्षतिग्रस्त भागों को भी बदलने के लिए मीयादी ऋण और कच्चे माल की खरीद एवं गोदामों के लिए कार्यशील पूंजी तत्काल उपलब्ध करवाना आवश्यक है ।

44. जहाँ कच्चा अथवा तैयार माल बह गया या खराब या क्षतिग्रस्त हो गया हो वहाँ कार्यशील पूंजी के लिए बैंक के पास रखी गई जमानत निःसंदेह समाप्त हो जायेगी तथा कार्यशील पूंजी खाता (नकदी उधार /ऋण) खराब हो जायेगा । ऐसे मामलों में बैंक जमानत के मूल्य से अधिक आहरणों को मीयादी ऋण में बदल देगा तथा उधारकर्ता को अतिरिक्त कार्यशील पूँजी भी प्रदान करेगा ।

45. इस प्रकार हुई हानि और पुनर्वास एवं उत्पादन और बिक्री को पुनः शुरु करने के लिए आवश्यक, समय के आधार पर, निर्माण करने की क्षमता को देखते हुए इकाई की आय के अनुसार मीयादी ऋणों की किस्तों को उपयुक्त रुप से पुनर्निर्धारित किया जाना चहिए । मार्जिन में हुई कमी में छूट देनी होगी अथवा उसे माफ भी किया जा सकता है और उधारकर्ता को उसके भविष्य में होने वाले नकद सृजन से धीरे - धीरे मार्जिन का निर्माण करने हेतु समय दिया जाना चाहिए । जहाँ राज्य सरकार अथवा अन्य एजेंसी ने अनुदान/सब्सिडी/प्रारंभिक धन के लिए विशेष योजनाएँ तैयार की हों, वहाँ ऐसे अनुदान /सब्सिडी/प्रारंभिक धन के लिए उपयुक्त मार्जिन निर्धारित किया जाए ।

46. लघु/अत्यंत लघु इकाइयों को उनके पुनर्वास के लिए ऋण प्रदान करते समय बैंकों का ध्यान पुनर्वास कार्यक्रम शुरु करने के उपरांत मुख्य रुप से उद्यम की व्यवहार्यता पर होना चाहिए ।

V. अन्य मामले

क) कारोबार निरन्तरता योजना

47. बैंकिंग प्रणाली में तकनीक के बढ़ते हुए परिदृश्य में कारोबार निरन्तरता योजना (बीसीपी), कारोबार में रूकावट और प्रणाली असफलता को कम करने के लिए पहली प्रमुख अपेक्षा है। कारोबार निरन्तरता योजना (बीसीपी) प्रणाली के रूप में, बैंक प्राकृतिक आपदा के घेरे में आने वाली संभावित शाखाओं के लिए अन्य शाखाओं की पहचान करें। वर्तमान अनुदेशों के अनुसार, बैंकों के बोर्डों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे बीसीपी पर नीति का अनुमोदन करें, पर्याप्त संसाधनों का आबंटन करें तथा उच्च प्रबंधन को इस संबंध में स्पष्ट अनुदेश और निर्देश उपलब्ध कराएँ। बैंकों केवल आपदा वसूली (डीआर) व्यवस्था के स्थान पर संपूर्ण विस्तृत बीसीपी तैयार करें। बैंकों डीआर स्थान की विस्तृत जांच करने में अपना ध्यान केंद्रित करें और प्राथमिक और द्वितीयक साइटों के बीच आँकड़े साथ-साथ रखें ।

ख) ग्राहकों की अपने बैंक खातों तक पहुँच

48. ऐसे क्षेत्र जहां बैंक शाखाएँ प्राकृतिक आपदाओं से प्रभावित हुए हैं तथा सामान्य रूप से कार्य नहीं कर पा रहे हैं वहां बैंक भारतीय रिज़र्व बैंक को सूचित करते हुए अस्थायी परिसर से परिचालन कर सकते हैं । अस्थायी परिसर में 30 दिन से अधिक समय बने रहने के लिए भारतीय रिज़र्व बैंक के क्षेत्रीय कार्यालय को सूचना देते हुए अनुषंगी कार्यालय, विस्तार काउंटर गठित करके या मोबाइल बैंकिंग सुविधाओं द्वारा प्रभावित क्षेत्रों को बैंकिंग सेवाएं प्रदान की जाती है।

ग्राहकों की तत्काल नकदी आवश्यकताओं को संतुष्ट करने हेतु बैंक सावधि जमा जैसे खातों को सुलभ बनाने संबंधी दंड में छूट देने पर विचार कर सकता है ।

एटीएम के कार्य को फिर से शीघ्र चालू करने या ऐसी सुविधाएं उपलब्ध करवाने हेतु अन्य व्यवस्था को उचित महत्व दिया जाए बैंक ऐसी व्यवस्था पर विचार कर सकते हैं जिससे ग्राहक अन्य एटीएम नेटवर्क, मोबाइल एटीएम आदि तक पहुँच सकें।

ग) मुद्रा प्रबंधन

49. यदि बैंक की मुद्रा तिजोरी शाखा प्रभावित हुई है तो बैंक अन्य बैंक के किसी भी नजदीकी कार्यरत मुद्रा तिजोरी शाखा से संपर्क कर सकता है जो प्रभावित मुद्रा तिजोरी को मुद्रा नोटों की आपूर्ति कर सकता हो ताकि बैंक उससे सहलग्न बैंक शाखाओं को नकदी की आपूर्ति कर सकें; इसकी जानकारी भारतीय रिज़र्व बैंक के संबंधित क्षेत्रीय कार्यालय को दी जाए। यदि आवश्यक हो तो जिन बैंकों की मुद्रा तिजोरी प्रभावित हुई हो वे भारतीय रिज़र्व बैंक के संबंधित क्षेत्रीय कार्यालय को सूचना देते हुए अस्थायी अवधि के लिए निक्षेपागार खोल सकते हैं ताकि दैनंदिन नकदी आवश्यकताओं की पूर्ति की जा सके ।

घ) केवाइसी मानदंड

50. प्राकृतिक आपदाओं से प्रभावित व्यक्तियों को नए खाते खुलवाने हेतु विशेषतः सरकार / अन्य एजेंसियों द्वारा दिये जानेवाले विभिन्न राहतों का उपभोग करने हेतु बैंक निम्नलिखित आधार पर खाता खोल सकते हैं -

क. अन्य खाता धारक, जो संपूर्ण केवाइसी प्रक्रिया से गुजरा हो, से परिचय या

ख. पहचान के दस्तावेज जैसे वोटर पहचान पत्र या ड्राइविंग लाइसेंस, किसी कार्यालय,
कंपनी, विद्यालय, महाविद्यालय द्वारा जारी पहचान पत्र के साथ पता दर्शाता हुआ
दस्तावेज जैसे बिजली का बिल, राशन कार्ड आदि, या

ग. दो पड़ोसियों का परिचय जिनके पास उपर्युक्त पैरा 50 (ख) में दर्शाये दस्तावेज हों,
या

घ. उपर्युक्त न होने पर अन्य कोई सबूत जिससे बैंक संतुष्ट हो ।

उपर्युक्त अनुदेश उन मामलों पर लागू होंगे जहां खाते में शेष 50,000/- रु. से अधिक न हो या प्रदान की गई राहत की राशि (यदि अधिक हो) और खाते में कुल जमा 1,00,000/- रु. या एक वर्ष में प्रदान राहत की राशि (यदि अधिक हो) से अधिक न हो ।

ङ) समाशोधन एवं निपटान प्रणाली

51. समाशोधन सेवा में निरन्तरता सुनिश्चित करने हेतु भारतीय रिज़र्व बैंक ने बैंकों को 20 बड़े शहरों में "ऑन-सिटी बैक-अप केंद्र" तथा शेष शहरों के लिए प्रभावी अल्प लागत निपटान समाधान के संबंध में सूचित किया। समाशोधन क्षेत्र में जहां सामान्य समाशोधन सेवाओं में बाधाएं आती हों वहां बैंक लचीली समाशोधन सेवाएं उपलब्ध करा सकता है। तथापि, इन व्यवस्थाओं के बावजूद बैंक ग्राहकों की निधि अपेक्षाओं की पूर्ति के लिए बड़ी राशि के लिए चेक भुनाने हेतु विचार कर सकता है जहाँ समाशोधन सुविधाएं बाधित हुई हो। बैंक इएफटी, इसीएस या डाक सेवाओं के शुल्क में छूट देने पर विचार कर सकता है ताकि प्राकृतिक आपदा से प्रभावित व्यक्तियों के खातों में निधि अंतरण हो सके ।

VI. दंगे और गड़बड़ी के मामलों में दिशा-निर्देशों की प्रयोज्यता

52. भारतीय रिज़र्व बैंक जब भी बैंकों को दंगे / गड़बड़ी से प्रभावित लोगों को पुनर्वास सहायता प्रदान करने के लिए कहे तब इस प्रयोजनार्थ बैंकों द्वारा उक्त दिशा-निर्देशों का व्यापक रूप से पालन किया जाए। तथापि, यह सुनिश्चित किया जाए कि केवल वास्तविक व्यक्ति, राज्य प्रशासन द्वारा यथोचित रूप से पहचाने गये तथा दंगे / गड़बड़ी से प्रभावित व्यक्तियों को ही दिशा-निर्देशों के अनुसार सहायता उपलब्ध करवायी जाती है ।

राज्य सरकार से अनुरोध / सूचना प्राप्त होने पर भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा बैंकों को सूचना जारी करने के बाद बैंकों द्वारा उनकी शाखाओं को अनुदेश जारी किए जाते हैं। इस कारण दंगों से प्रभावित लोगों को सहायता प्रदान करने में सामान्यतः विलंब हो जाता है। प्रभावित लोगों को तत्काल सहायता सुनिश्चित करने के लिए यह निर्णय लिया गया है कि दंगे / गड़बड़ी होने पर जिलाधीश अग्रणी बैंक अधिकारी को जिला परामर्शदात्री समिति की बैठक, यदि आवश्यक हो, बुलाने के लिए तथा दंगो / गड़बड़ी से प्रभावित क्षेत्रों में जान और माल की हानि पर एक रिपोर्ट जिला परामर्शदात्री समिति को प्रस्तुत करने हेतु कह सकता है। यदि जिला परामर्शदात्री समिति संतुष्ट है कि दंगे / गड़बड़ी के कारण जान और माल की व्यापक हानि हुई है, तो दंगे / गड़बड़ी से प्रभावित लोगों को उपर्युक्त दिशा-निर्देशों के अनुसार राहत प्रदान की जाए। कुछ मामलों में, जहाँ जिला परामर्शदात्री समितियाँ नहीं है, जिलाधीश राज्य के राज्य स्तरीय बैंकर समिति के संयोजक को प्रभावित लोगों को राहत प्रदान करने हेतु विचार करने के लिए बैंकरों की एक बैठक बुलाने के लिए अनुरोध कर सकता है। जीलाधीश द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट तथा उस पर जिला परामर्शदात्री / राज्य स्तरीय बैंकर समिति द्वारा लिये गये निर्णयों को रिकार्ड किया जाए और उसे बैठक के कार्य-विवरण में शामिल किया जाए। बैठक की कार्यवाही की एक प्रति भारतीय रिज़र्व बैंक के संबोधित क्षेत्रीय कार्यालय को प्रेषित की जाए।

VII. व्यापार और उद्योग के मामलों में दिशा-निर्देशों की व्यावहारिकता

53. पुनर्निर्धारित ऋणों के अधिस्थगन, अधिकतम चुकौती अवधि, अतिरिक्त संपार्श्विक तथा नए वित्त के आस्ति वर्गीकरण के संबंध में अनुदेश कृषि के साथ-साथ उद्योग और व्यापार के खातों सहित सभी प्रभावित पुनर्निर्धारित उधार खातों पर लागू होंगे।


परिशिष्ट

मास्टर परिपत्र
प्राकृतिक आपदाओं द्वारा प्रभावित क्षेत्रों में
बैंकों द्वारा राहत उपायों हेतु दिशानिर्देश
मास्टर परिपत्र में संकलित परिपत्रों की सूची

सं.

परिपत्र सं.

तारीख

विषय

1.

ग्राआऋवि.सं.पीएस.बीसी. 06/पीएस.126-84

02.08.84

प्राकृतिक आपदाओं से प्रभावित क्षेत्रों में बैंकों द्वारा राहत उपायों के लिए संशोधित दिशानिर्देश

2.

ग्राआऋवि.सं.पीएलएफएस. बीसी.38/पीएस126-91-92

21.09.91

दंगों / सांप्रदायिक गड़बड़ी इत्यादि से प्रभावित लोगों को बैंकों से सहायता

3.

ग्राआऋवि.सं.पीएलएफएस. बीसी.59/05.04.02/92-93

06.01.93

प्राकृतिक आपदाओं से प्रभावित क्षेत्रों में बैंकों द्वारा राहत उपायों हेतु दिशानिर्देश - (उपभोग ऋण )

4.

ग्राआऋवि.सं.पीएलएफएस. बीसी.128/05.04.02/97-98

20.06.98

प्राकृतिक आपदाओं से प्रभावित लोगों के लिए राहत उपाय-कृषि अग्रिम

5.

ग्राआऋवि.पीएलएफएस. बीसी.सं.42/05.02.02/05-06

1.10.2005

बैंकिंग प्रणाली से कृषि और संबंधित गतिविधियों के लिए ऋण उपलब्ध कराने के संबध में परामर्शदात्री समिति

6.

ग्राआऋवि.केका. पीएलएफएस.सं.बीसी.16/ 05.04.02/2006-07

9.8.2006

प्राकृतिक आपदाओं से प्रभावित क्षेत्रों में बैंकों द्वारा किए जानेवाले राहत उपायों के लिए दिशा-निर्देश

7.

ग्राआऋवि.पीएलएफएस.सं. बीसी.21/05.04.02/2006-07

4.9.2006

प्राकृतिक आपदाओं से प्रभावित क्षेत्रों में बैंकों द्वारा किए जानेवाले राहत उपायों के लिए दिशा-निर्देश

8.

ग्राआऋवि.पीएलएफएस.सं. 2995/05.02.02/2010-11

6.9.2010

प्राकृतिक आपदाएं होने पर बैंकों द्वारा उधार खातों का पुननिर्धारण

 
 
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