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मास्टर परिपत्र - माइक्रो, लघु और मध्यम उद्यम (एमएसएमई) क्षेत्र को उधार

भारिबैं/2014-15/93
ग्राआऋवि.सं.एमएसएमई एण्ड एनएफएस.बीसी. 03/06.02.31/2014-15

1 जुलाई 2014

अध्यक्ष / प्रबंध निदेशक / मुख्य कार्यपालक अधिकारी
सभी अनुसूचित वाणिज्य बैंक
(क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों को छोड़कर)

महोदय/ महोदया

मास्टर परिपत्र -
माइक्रो, लघु और मध्यम उद्यम (एमएसएमई) क्षेत्र को उधार

जैसा कि आपको ज्ञात है, भारतीय रिज़र्व बैंक ने बैंकों को माइक्रो, लघु और मध्यम उद्यम क्षेत्र को उधार से संबंधित मामलों में समय-समय पर दिशा-निर्देश/अनुदेश/निदेश जारी किए हैं । बैंकों को सभी वर्तमान अनुदेश एक स्थान पर उपलब्ध कराने के प्रयोजन से उपर्युक्त विषय पर विद्यमान दिशा-निर्देशों /अनुदेशों /निदेशों को समाहित करते हुए एक मास्टर परिपत्र तैयार किया गया है जो संलग्न है । इस मास्टर परिपत्र में, परिशिष्ट में सूचीबद्ध किए हुए, भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा 30 जून 2014 तक जारी वाणिज्य बैंकों द्वारा माइक्रो, लघु और मध्यम उद्यम क्षेत्र को उधार देने से संबंधित उन सभी अनुदेशों को समेकित किया गया है ।

2. कृपया प्राप्ति सूचना दें ।

भवदीया

(माधवी शर्मा)
मुख्य महाप्रबंधक


खण्ड – I

1॰ माइक्रो , लघु और मध्यम उद्यम विकास (एमएसएमईडी) अधिनियम, 2006

भारत सरकार ने दिनांक 16 जून 2006 को माइक्रो, लघु और मध्यम उद्यम विकास (एमएसएमईडी) अधिनियम, 2006 बनाया है जिसे 2 अक्तूबर 2006 को अधिसूचित किया गया। एमएसएमईडी अधिनियम, 2006 लागू हो जाने से जो स्पष्ट परिवर्तन आया है वह है उक्त क्षेत्र में मध्यम उद्यमों को सम्मिलित करने के अलावा माइक्रो, लघु और मध्यम उद्यम की परिभाषा में सेवा क्षेत्र को शामिल करना है। माइक्रो, लघु और मध्यम उद्यम विकास (एमएसएमईडी) अधिनियम, 2006 ने विनिर्माण या उत्पादन तथा सेवाएं उपलब्ध या प्रदान करने में लगे माइक्रो, लघु और मध्यम उद्यम की परिभाषा आशोधित की है। रिज़र्व बैंक ने सभी अनुसूचित वाणिज्य बैंकों को परिवर्तन के बारे में सूचित कर दिया है। इसके साथ ही, अधिनियम में दी गई परिभाषा को, रिज़र्व बैंक के दिनांक 4 अप्रैल 2007 के परिपत्र ग्राआऋवि.पीएलएनएफएस.बीसी.सं. 63/06.02.31/2006-07 के अनुसार बैंक ऋण के प्रयोजनों के लिए अपनाया गया है ।

1.1 माइक्रो , लघु और मध्यम उद्यम की परिभाषा

(a) विनिर्माण उद्यम अर्थात नीचे विनिर्दिष्ट किए गए अनुसार वस्तुओं के विनिर्माण, प्रसंस्करण या परिरक्षण के कार्य में लगे उद्यम :

  1. माइक्रो उद्यम एक ऐसा उद्यम है जिसका संयंत्र और मशीनों में निवेश 25 लाख रुपए से अधिक न हो;

  2. लघु उद्यम एक ऐसा उद्यम है जिसका संयंत्र और मशीनों में निवेश 25 लाख रुपए से अधिक हो परंतु 5 करोड़ रुपए से अधिक न हो ; तथा

  3. मध्यम उद्यम एक ऐसा उद्यम है जिसका संयंत्र और मशीनों में निवेश 5 करोड़ रुपए से अधिक हो परंतु 10 करोड़ रुपए से अधिक न हो।

उपर्युक्त उद्यमों के मामले में, संयंत्र और मशीनों में निवेश वह मूल लागत है जिसमें भूमि और भवन तथा लघु उद्योग मंत्रालय द्वारा दिनांक 5 अक्तूबर 2006 की अधिसूचना सं. एसओ.1722 (इ) में निर्दिष्ट मद शामिल नहीं हैं (अनुबंध 1) ।

(b) सेवा उद्यम अर्थात सेवाएं उपलब्ध कराने अथवा प्रदान करने में लगे उद्यम एवं जिनका उपकरणों में निवेश (भूमि और भवन तथा फर्नीचर, फिटिंग्स और ऐसी अन्य मदों को, जो प्रदान की जाने वाली सेवाओं से प्रत्यक्ष रूप से संबंधित नहीं हैं या एमएसएमईडी अधिनियम, 2006 में यथा अधिसूचित मदों को छोड़कर मूल लागत) नीचे विनिर्दिष्ट किया गया है :

  1. माइक्रो उद्यम वह उद्यम है जिसका उपकरणों में निवेश 10 लाख रूपए से अधिक न हो;

  2. लघु उद्यम वह उद्यम है जिसका उपकरणों में निवेश 10 लाख रुपए से अधिक हो परंतु 2 करोड़ रुपए से अधिक न हो; और

  3. मध्यम उद्यम वह उद्यम है जिसका उपकरणों में निवेश 2 करोड़ रुपए से अधिक हो परंतु 5 करोड़ रुपए से अधिक न हो।

1.2 बैंकों द्वारा विनिर्माण और सेवा दोनों के माइक्रो और लघु उद्यमों को दिए जानेवाले बैंक ऋण निम्नानुसार प्राथमिकताप्राप्त क्षेत्र के अंतर्गत वर्गीकृत किए जाने के पात्र होंगे:

1.2.1 प्रत्यक्ष वित्त

1.2.1.1 विनिर्माण उद्यम

उद्योग (विकास और विनियमन) अधिनियम 1951 की प्रथम अनुसूची में निर्दिष्ट और सरकार द्वारा समय-समय पर अधिसूचित प्रकार से किसी उद्योग के लिए विनिर्माण या वस्तुओं के उत्पादन में लगी माइक्रो और लघु उद्यम संस्थाएं। विनिर्माण उद्यमों को संयंत्र और मशीनरी में निवेश के अनुसार परिभाषित किया गया है ।

1.2.1.2 खाद्यान्न तथा एग्रो प्रसंस्करण के लिए ऋण

खाद्यान्न तथा एग्रो प्रसंस्करण के लिए ऋणों को माइक्रो और लघु उद्यमों के अंतर्गत वर्गीकृत किया जाएगा बशर्ते यूनिट एमएसएमईडी अधिनियम, 2006 में किए गए प्रावधान के अनुसार माइक्रो और लघु उद्यमों के लिए निर्धारित निवेश मानदंड पूरा करते हों ।

1.2.1.3 सेवा उद्यम

एमएसएमईडी अधिनियम 2006 के अंतर्गत उपकरणों में निवेश के अनुसार परिभाषित और सेवाएं उपलब्ध कराने या प्रदान करने में लगे माइक्रो और लघु उद्यमों को प्रति उधारकर्ता/यूनिट 5 करोड़ रुपए तक का बैंक ऋण।

1.2.1.4 निर्यात ऋण

एमएसई यूनिटों (विनिर्माण और सेवा दोंनों) को उनके द्वारा उत्पादित वस्तुओं/सेवाओं के निर्यात के लिए निर्यात ऋण।

1.2.1.5 खादी और ग्रामोद्योग क्षेत्र (केवीआई)

खादी और ग्रामोद्योग क्षेत्र की इकाइयों को, परिचालनों के आकार, अवस्थिति तथा संयंत्र और मशीनरी में मूल निवेश की राशि पर ध्यान दिए बिना प्रदत्त सभी अग्रिम प्राथमिकताप्राप्त क्षेत्र को अग्रिम के अंतर्गत शामिल होंगे तथा एमएसई क्षेत्र के अंतर्गत सूक्ष्म (माइक्रो) उद्यम हेतु 60 प्रतिशत के नियत उप-लक्ष्य के अधीन विचार करने के लिए पात्र होंगे।

1.2.1.6 यदि माइक्रो और लघु उद्यमों को सामान्य क्रेडिट कार्ड (जीसीसी) के अंतर्गत ऋण मंजूर किया जाता है तो ऐसे ऋणों को माइक्रो और लघु उद्यमों की संबंधित श्रेणियों में वर्गीकृत किया जाना चाहिए।

1.2.2 अप्रत्यक्ष वित्त

i) काश्तकारों, ग्राम और कुटीर उद्योगों को निविष्टियों की आपूर्ति और उनके उत्पादन के विपणन के विकेंद्रीकृत सेक्टर को सहायता प्रदान करनेवाले व्यक्तियों को ऋण।

ii) विकेंद्रित सेक्टर अर्थात् काश्तकार तथा ग्राम और कुटीर उद्योग के उत्पादकों की सहकारी समितियों को ऋण।

iii) प्राथमिकताप्राप्त क्षेत्र को उधार पर वर्तमान मास्टर परिपत्र में निर्दिष्ट शर्तों के अनुसार एमएफआई को आगे एमएसई सेक्टर को ऋण देने के लिए बैंकों द्वारा स्वीकृत ऋण।

1.3 बैंकों द्वारा मध्यम उद्यमों को दिए गए ऋण को प्राथमिकताप्राप्त क्षेत्र के अंतर्गत अग्रिमों की गणना के लिए शामिल नहीं किया जाएगा ।

1.4 चूँकि एमएसएमई अधिनियम, 2006 में उसी व्यक्ति / कंपनी द्वारा स्थापित भिन्न-भिन्न उद्यमों के निवेशों को सूक्ष्म (माइक्रो), लघु और मध्यम उद्यमों के रूप में वर्गीकरण के प्रयोजनार्थ एक साथ मिलाने (क्लब करने) का प्रावधान नहीं है, इसलिए औद्योगिक उपक्रमों के लघु उद्योग के रूप में वर्गीकरण के प्रयोजन हेतु एक ही स्वामित्व के दो या अधिक उद्यमों के निवेशों को एक साथ मिलाने के संबंध में 1 जनवरी 1993 की गज़ट अधिसूचना सं. एस.ओ. 2 (ई) को 27 फरवरी 2009 की भारत सरकार की अधिसूचना सं. एस.ओ. 563 (ई) के द्वारा रद्द कर दिया गया है।

खंड – II

2. लघु उद्यम वित्तीय केन्द्रों की (एसईएफसी) योजना:

वार्षिक नीति वक्तव्य 2005-06 में गवर्नर महोदय द्वारा की गई घोषणा के अनुसार लघु उद्योग मंत्रालय और बैंकिंग प्रभाग, वित्त मंत्रालय, भारत सरकार, सिडबी, आईबीए और चुनिंदा बैंकों के परामर्श से समूहों में स्थित बैंकों और सिडबी की शाखाओं के बीच "लघु उद्यम वित्तीय केंद्र" नामक कार्यनीतिक सहयोग की एक योजना तैयार की गई है और कार्यान्वयन हेतु 20 मई 2005 को सभी अनुसूचित वाणिज्य बैंकों को परिचालित की गई है । सिडबी ने अब तक 15 बैंकों (बैंक ऑफ इंडिया, यूको बैंक, येस बैंक, बैंक ऑफ बड़ौदा, ओरियंटल बैंक ऑफ कॉमर्स, पंजाब नेशनल बैंक, देना बैंक, आंध्रा बैंक, इंडियन बैंक, कार्पोरेशन बैंक, आइडीबीआई बैंक, इंडियन ओवरसीज़ बैंक, यूनियन बैंक ऑफ इंडिया, भारतीय स्टेट बैंक, तथा फेडरल बैंक) के साथ समझौता ज्ञापन संपादित किया है। वर्तमान सिडबी शाखाओं द्वारा कवर किये गये माइक्रो, लघु और मध्यम उद्यम समूहों की सूची अनुबंध II में प्रस्तुत है।

खंड III

3. घरेलू वाणिज्य बैंकों और भारत में कार्यरत विदेशी बैंकों द्वारा लघु और मध्यम उद्यमों (एमएसई) को दिए जाने वाले उधार का लक्ष्य

3.1 माइक्रो और लघु उद्यम (एमएसई) क्षेत्र अग्रिमों को समायोजित निवल बैंक ऋण (एएनबीसी) या तुलन पत्र से इतर एक्सपोज़र के बराबर ऋण राशि, इनमें से जो भी अधिक हो, के प्राथमिकताप्राप्त क्षेत्र के 40 प्रतिशत के समग्र लक्ष्य (भारत में 20 से कम शाखाओं के साथ कार्यरत विदेशी बैंकों के लिए 32 प्रतिशत) की गणना में हिसाब में लिया जाएगा।

3.2 सेवाएं उपलब्ध कराने अथवा प्रदान करने में लगे और उपकरणों में निवेश के संदर्भ में एमएसएमईडी अधिनियम, 2006 के अंतर्गत लघु और मध्यम उद्यमों को बैंकों द्वारा दिए जानेवाले प्रति उधारकर्ता 5 करोड़ रुपए से अधिक के ऋणों को समग्र प्राथमिकताप्राप्त क्षेत्र लक्ष्यों की गणना में हिसाब में नहीं लिया जाएगा। तथापि, एमएसई क्षेत्र को उधार हेतु एमएसएमई पर प्रधानमंत्री टास्क फोर्स द्वारा निर्धारित लक्ष्यों की बैंकों की उपलब्धि के संदर्भ में उनके कार्यनिष्पादन के मूल्यांकन के समय ऐसे ऋणों को हिसाब में लिया जाएगा।

3.3 एमएसएमई पर प्रधानमंत्री टास्क फोर्स की सिफारिशों के अनुसार बैंकों को माइक्रो और लघु उद्यमों को ऋण में 20 प्रतिशत वर्ष-दर-वर्ष संवृद्धि तथा माइक्रो उद्यम खातों की संख्या में 10 प्रतिशत की वर्ष-दर-वर्ष संवृद्धि प्राप्त करने हेतु सूचित किया गया है।

3.4 एमएसई क्षेत्र के भीतर माइक्रो उद्यमों को पर्याप्त ऋण की उपलब्धता सुनिश्चित करने हेतु बैंकों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि -

(क) एमएसई क्षेत्र हेतु नियत कुल अग्रिम का 40 प्रतिशत ऐसे माइक्रो (विनिर्माण) उद्यम जिनका संयंत्र और मशीनरी में 10 लाख रुपये तक का निवेश हो, तथा ऐसे माइक्रो (सेवा) उद्यम जिनका उपस्कर में 4 लाख रुपए तक का निवेश हो, को दिया जाना चाहिए;

(ख) एमएसई क्षेत्र के लिए नियत कुल अग्रिम का 20% ऐसे माइक्रो (विनिर्माण) उद्यम जिनका संयंत्र और मशीनरी में किया गया निवेश 10 लाख रुपए से अधिक और 25 लाख रुपए तक हो तथा माइक्रो (सेवा) उद्यम जिनका उपस्कर में किया गया निवेश 4 लाख रुपए से अधिक और 10 लाख रुपए तक हो, को दिया जाना चाहिए। इस तरह एमएसई अग्रिमों का 60% माइक्रो उद्यमों को जाना चाहिए ।

(ग) जबकि प्रधानमंत्री टास्क फोर्स की सिफारिशों के अनुसार बैंकों को उपर्युक्तानुसार 60% लक्ष्य प्राप्त करने हेतु सूचित किया गया, माइक्रो उद्यमों को एमएसई अग्रिमों का 60% आबंटन चरणों में प्राप्त किया जाना है अर्थात् वर्ष 2010-11 में 50%, वर्ष 2011-12 में 55% तथा वर्ष 2012-13 में 60%।

3.5 एमएसई क्षेत्र के भीतर माइक्रो उद्यमों को उधार हेतु लक्ष्य (अर्थात एमएसई क्षेत्र को कुल उधार का 60 प्रतिशत माइक्रो उद्यमों को दिया जाना चाहिए) की गणना पिछले 31 मार्च को एमएसई क्षेत्र को बकाया ऋण के संदर्भ में की जाएगी।

खंड IV

4. एमएसएमई क्षेत्र को उधार देने के लिए सामान्य दिशा-निर्देश / अनुदेश

4.1 एमएसएमई उधारकर्ताओं को ऋण आवेदनपत्रों की प्राप्ति सूचना जारी करना

बैंकों को सूचित किया गया है कि वे अपने एमएसएमई उधारकर्ताओं द्वारा व्यक्तिगत रूप से अथवा ऑनलाइन प्रस्तुत किए गए सभी ऋण आवेदनपत्रों की प्राप्ति सूचना अनिवार्य रूप से दें तथा यह सुनिश्चित करें कि आवेदन फॉर्म एवं प्राप्ति सूचना रसीद पर रनिंग क्रम संख्या दर्ज की जाए। साथ ही बैंकों को ऋण आवेदनपत्रों का केंद्रीकृत पंजीकरण प्रारंभ करने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है। ऋण आवेदनपत्रों को ऑनलाइन प्रस्तुत करने तथा ऋण आवेदनपत्रों की ऑनलाइन ट्रैकिंग के लिए इसी टेक्नॉलॉजी का प्रयोग किया जाए।

4.2 संपार्श्विक

बैंकों को अनिवार्य किया गया है कि एमएसई क्षेत्र में इकाइयों को 10 लाख रूपए तक दिए गए ऋणों के मामलों में संपार्श्विक जमानत स्वीकार न करें। बैंकों को यह भी सूचित किया गया कि केवीआइसी के प्रधानमंत्री रोजगार सृजन कार्यक्रम के अंतर्गत वित्तपोषित सभी इकाइयों को 10 लाख रूपए तक संपार्श्विक रहित ऋण प्रदान किया जाए।

एमएसई इकाइयों का अच्छा रिकार्ड तथा वित्तीय स्थिति के आधार पर बैंक, ऋण हेतु संपार्श्विक अपेक्षाओं में छूट की सीमा को (उचित प्राधिकारी के अनुमोदन से) 25 लाख रुपए तक बढ़ा सकते है।

बैंकों को सूचित किया गया है कि वे अपने शाखा स्तरीय अधिकारियों को ऋण गारंटी योजना कवर का उपभोग कराने हेतु प्रभावशाली ढंग से प्रोत्साहित करें तथा इस सबंध में उनके फील्ड स्टाफ के कार्य-निष्पादन को उनके मूल्यांकन में मानदंड के रूप में शामिल करें।

4.3 संमिश्र ऋण

बैंकों द्वारा 1 करोड़ रु. तक की संमिश्र ऋण सीमा स्वीकृत की जा सकती है ताकि एमएसई उद्यमी एक ही स्थान पर अपनी कार्यशील पूंजी और मीयादी ऋण अपेक्षाओं का उपयोग कर सके।

4.4 एमएसएमई की विशेषीकृत शाखाएं

सरकारी क्षेत्र के बैंकों को सूचित किया गया है कि वे प्रत्येक जिले में कम से कम एक विशेषीकृत शाखा खोलें। साथ ही, बैंकों को अनुमति दी गई है कि वे 60% से अधिक एमएसएमई क्षेत्र को अग्रिम वाली अपनी सामान्य बैंकिंग शाखाओं को विशेषीकृत एमएसएमई शाखाओं के रुप में वर्गीकृत कर सकते हैं ताकि वे समग्र रुप से इस क्षेत्र को बेहतर सेवा उपलब्ध कराने हेतु और अधिक विशेषीकृत एमएसएमई शाखाएं खोल सकें। एमएसएमई क्षेत्र को ऋण में वृध्दि हेतु भारत सरकार द्वारा घोषित पॉलिसी पैकेज के अनुसार सरकारी क्षेत्र के बैंक लघु उद्यमों की अधिकता वाले पहचाने गये समूहों / केन्द्रों में विशेषीकृत एमएसएमई शाखाएं सुनिश्चित करेंगे ताकि उद्यमी आसानी से बैंक ऋण ले सकें तथा बैंक कार्मिक आवश्यक विशेषज्ञता विकसित कर सकें। विद्यमान विशेषीकृत लघु उद्योग शाखाओं को एमएसएमई शाखाओं के रुप में पुनःनामित किया जाए। हालांकि उनकी महत्वपूर्ण क्षमता एमएसएमई क्षेत्र को वित्त और अन्य सेवाएं प्रदान करने हेतु उपयोग में लायी जाएगी, उनके पास अन्य क्षेत्रों / उधारकर्ताओं को वित्त / अन्य सेवाएं प्रदान करने का परिचालन संबंधी लचीलापन रहेगा ।

4.5 विलंबित भुगतान

लघु उद्योग और अनुषंगी औद्योगिक उपक्रमों को विलंबित भुगतान पर ब्याज से संबंधित संशोधन अधिनियम, 1998 के अंतर्गत एमएसएमइ इकाइयों को विलंबित भुगतान की देख-रेख के लिए दंडात्मक प्रावधान शामिल किए गए हैं । माइक्रो, लघु और मध्यम उद्यम विकास अधिनियम (एमएसएमइडी), 2006 लागू होने के बाद लघु एवं अनुषंगी औद्योगिक उपक्रमों के लिए विलंबित भुगतान पर ब्याज अधिनियम, 1998 के वर्तमान प्रावधानों को मजबूत किया गया है जो निम्नानुसार हैं :

  1. क्रेता को उसके और आपूर्तिकर्ता के बीच लिखित रुप में सहमत तारीख को या उससे पूर्व आपूर्तिकर्ता को भुगतान करना होगा और यदि कोई समझौता नहीं हुआ हो तो नियत दिन से पूर्व भुगतान करना होगा। आपूर्तिकर्ता और क्रेता के बीच की सहमत अवधि स्वीकरण की तारीख अथवा माने गए स्वीकरण दिन से 45 (पैंतालीस) दिनों से अधिक नहीं होगी ।

  2. यदि क्रेता आपूर्तिकर्ता को राशि का भुगतान नहीं कर पाया तो वह राशि पर नियत दिन या निर्धारित तारीख से रिज़र्व बैंक द्वारा अधिसूचित बैंक दर का तीन गुना चक्रवृद्धी ब्याज, मासिक अंतराल सहित भुगतान करने हेतु बाध्य होगा।

  3. आपूर्तिकर्ता द्वारा माल या सेवा की आपूर्ति के लिए क्रेता उक्त (ii) में सूचित ब्याज के भुगतान हेतु बाध्य होगा।

  4. देय राशि में विवाद होने पर संबंधित राज्य सरकार द्वारा गठित माइक्रो और लघु उद्यम सुविधा सेवा परिषद से संपर्क किया जाएगा।

साथ ही, बैंकों को सूचित किया गया है कि वे विशेषतः एमएसएमइ से खरीद से संबंधित भुगतान बाध्यता की पूर्ति हेतु बड़े उधारकर्ताओं के लिए समग्र कार्यकारी पूंजी सीमाओं के भीतर उप-सीमाएं निर्धारित करें ।

4.6 रुग्ण माइक्रो और लघु उद्यमों के पुनर्वास पर संशोधित दिशा-निर्देश

संभाव्य रुप से अर्थक्षम रुग्ण एसएमई यूनिटों के पुनर्वास पर कार्यकारी दल (अध्यक्ष: डॉ के.सी.चक्रवर्ती) की सिफ़ारिशों के परिप्रेक्ष्य में रुग्णता की परिभाषा में परिवर्तन करने और एसएमई यूनिटों की अर्थक्षमता का निर्धारण करने के लिए एक क्रियाविधि बनाने के संबंध में एमएसएमई मंत्रालय द्वारा इस विषय पर विचार करने के लिए एक समिति गठित की गई थी। उक्त समिति की सिफारिशों के आधार पर 01 नवम्बर 2012 के हमारे परिपत्र ग्राआऋवि.एमएसएमइ एण्ड एनएफएस. सं.40/06.02.31/2012-13 द्वारा एमएसई क्षेत्र के रुग्ण यूनिटों के पुनर्वास पर संशोधित दिशानिर्देश जारी किए गए हैं।

संशोधित दिशानिर्देशों का उद्देश्य किसी यूनिट की रुग्ण के रूप में पहचान करने की प्रक्रिया में तेजी लाना, आरंभिक रुग्णता का पहले ही पता लगाना और किसी यूनिट को गैर-अर्थक्षम घोषित करने से पहले बैंकों द्वारा अपनायी जानेवाली एक क्रियाविधि बनाना है।

नए दिशानिर्देशों के अनुसार, माइक्रो और लघु उद्यमों (एमएसएमईडी अधिनियम, 2006 में यथा परिभाषित) को तभी रुग्‍ण कहा जाएगा जब (क) उद्यम का कोई उधारकर्ता खाता तीन महीने या अधिक समय से एनपीए बना हुआ हो; अथवा (ख) पिछले लेखा वर्ष के दौरान उसकी निवल संपत्ति में 50 प्रतिशत तक संचित हानि होने के कारण निवल संपत्ति का क्षरण हुआ हो।

संशोधित दिशनिर्देशों में किसी यूनिट को गैर-अर्थक्षम घोषित करने से पहले बैंकों द्वारा अपनायी जानेवाली क्रियाविधि भी उपलब्ध करायी गयी है। बैंकों को यह सूचित किया गया है कि यूनिट की अर्थक्षमता संबंधी निर्णय शीघ्र परंतु किसी भी परिस्थिति में यूनिट के रूग्ण बन जाने के 3 महीनों के भीतर लिया जाए और किसी यूनिट को संभाव्य रूप से अर्थक्षम/अर्थक्षम घोषित किए जाने की तारीख से छ: महीनों के भीतर पुनर्वास पैकेज को पूर्णत: कार्यान्वित किया जाना चाहिए।

4.7 माइक्रो और लघु उद्यम क्षेत्र को उधार – वित्तीय साक्षरता और परामर्शी सहायता की अनिवार्यता

एमएसएमई क्षेत्र में वित्तीय वंचन (एक्‍सक्‍लूजन) की मात्रा काफी अधिक (92 प्रतिशत) को देखते हुए बैंकों के लिए यह अनिवार्य है कि उक्त वंचित यूनिटों को औपचारिक बैंकिंग क्षेत्र के भीतर लाया जाए। लेखाकरण तथा वित्त, कारोबारी आयोजना आदि सहित वित्तीय साक्षरता, परिचालनगत कौशल का अभाव एमएसई के उधारकर्ताओं के लिए कठिन चुनौती बनी है, जिसके कारण इन जटिल वित्तीय क्षेत्रों से बैंकों द्वारा सुविधा प्रदान किए जाने की जरूरत अधोरेखित हो जाती है। साथ ही साथ, एमएसई उद्यम माप (स्केल) एवं आकार के अभाव के कारण इस संबंध में और असहाय बन जाते हैं। इन कमियों को कारगर ढ़ंग से तथा निर्णायक रुप से दूर करने के लिए अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों को 1 अगस्त 2012 के हमारे परिपत्र ग्राआऋवि.सं.एसएमइ एण्ड एनएफएस. बीसी.20/06.02.31/2012-13 द्वारा सूचित किया गया कि बैंक या तो अपनी शाखाओं में अपनी तुलनात्मक सुविधानुसार अलग से विशेष कक्ष स्थापित करें अथवा उनके द्वारा स्थापित वित्तीय साक्षरता केंद्रों में इसके लिए अलग कार्य मद (वर्टिकल) बनाएं। इस क्षेत्र की जरुरतों को पूरा करने के लिए बैंक के स्टाफ को भी अनुकूलित प्रशिक्षण के माध्यम से प्रशिक्षित कराया जाए।

4.8 एमएसई क्षेत्र को ऋण की वृद्धि पर निगरानी के लिए संरचित तंत्र

एमएसई क्षेत्र को ऋण की वृद्धि में कमी के कारण उत्‍पन्‍न चिंताओं को देखते हुए, इस क्षेत्र में ऋण संबंधी सभी मुद्दों की निगरानी के लिए बैंकों द्वारा सुनियोजित कार्यविधि का सुझाव देने के लिए भारतीय बैंक संघ की अगुवाई में एक उप-समिति (अध्यक्ष : के.आर.कामथ) गठित की गई थी। समिति की सिफारिशों के आधार पर यह निर्णय लिया गया है कि:

  • इस क्षेत्र को ऋण वृद्धि पर निगरानी के लिए वर्तमान प्रणालियों को सुदृढ़ करें और प्रत्‍येक पर्यवेक्षी स्‍तर पर (शाखा, क्षेत्र, अंचल, प्रधान कार्यालय) व्‍यापक निष्‍पादन प्रबंध सूचना प्रणाली (एमआईएस) स्‍थापित करें जिसकी नियमित आधार पर विवेचना की जाए;

  • बैंकों में ऋण आवेदन निपटान प्रक्रिया की निगरानी तथा एमएसई ऋण आवेदन की ई-ट्रैकिंग सिस्‍टम, जिसमें शाखा-वार, क्षेत्र-वार, अंचल-वार और राज्‍य-वार स्थिति दी जाए। इस संबंध में स्थिति बैंकों द्वारा उनकी वेबसाइट पर दिखाई जाए,और

  • रुग्ण एमएसई इकाइयों के समय पर पुनर्वास पर निगरानी रखें। रुग्ण एमएसई इकाइयों के पुनर्वास की प्रगति बैंकों की वेबसाइट पर दिखाई जाए

दिनांक 9 मई 2013 के हमारे परिपत्र ग्राआऋवि.एमएसएमई एण्ड एनएफएस. बीसी.सं.74/06.02.31/2012-13 के द्वारा सभी अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों को विस्‍तृत दिशानिर्देश जारी किए गए हैं।

4.9 संशोधित सामान्य क्रेडिट कार्ड (जीसीसी) योजना

समग्र प्राथमिकताप्राप्त दिशानिर्देशों के भीतर सभी उत्पादक गतिविधियों के लिए उच्चतर ऋण संबद्धता को सुनिश्चित करने के लिए जीसीसी योजना की व्याप्ति को बढ़ाने और व्यक्तियों को कृषीतर उद्यमी गतिविधि के लिए बैंकों द्वारा दिए गए समस्त क्रेडिट की जानकारी पा लेने की दृष्टि से जीसीसी दिशानिर्देशों को 2 दिसंबर 2013 को संशोधित किया गया है।

4.10. राज्य स्तरीय अंतर संस्थागत समिति

रुग्ण माइक्रो एवं लघु उद्योग इकाइयों के पुनर्वास हेतु समन्वय की समस्याओं से निपटने के लिए राज्यों में राज्य स्तरीय अंतर संस्थागत समितियाँ गठित की गई थीं। तथापि, राज्य स्तरीय अंतर संस्थागत समिति मंच का जारी रहना अथवा समाप्त किया जाना हर राज्य/ संघशासित क्षेत्र पर छोड़ दिया गया है। इन समितियों की बैठकें भारतीय रिज़र्व बैंक के क्षेत्रीय कार्यालयों द्वारा संबंधित राज्य सरकार के उद्योग सचिव की अध्यक्षता में की जाती हैं । यह समिति एक तरफ राज्य सरकार के अधिकारियों और राज्य स्तरीय संस्थानों तथा दूसरी तरफ मीयादी ऋण संस्थानों और बैंकों के बीच पर्याप्त आदान-प्रदान हेतु उपयोगी मंच उपलब्ध कराता है । यह उन इकाइयों को कार्यकारी पूंजी स्वीकृत करने पर कड़ी निगरानी रखता है जिन्हें एसएफसी द्वारा मीयादी ऋण उपलब्ध कराया गया हो, विशेष योजनाओं जैसे राज्य सरकार की मार्जिन मनी योजना, सिडबी की राष्ट्रीय ईक्विटी निधि योजना का कार्यान्वयन करता है तथा बैंकों द्वारा प्रस्तुत ब्योरे के आधार पर उद्योगों की सामान्य समस्याओं तथा लघु उद्योग में रूग्णता की समीक्षा करता है। दूसरों के साथ-साथ, स्थानीय राज्य स्तरीय लघु उद्योग संघ के प्रतिनिधियों को तिमाही आधार पर आयोजित एसएलआइआइसी की बैठकों में आमंत्रित किया जाता है। एसएलआइआइसी की एक उप-समिति प्रत्येक रूग्ण लघु उद्योग इकाई की समस्याओं की जांच करती है तथा अपनी सिफारिश एसएलआइआइसी के मंच के समक्ष विचारार्थ प्रस्तुत करती है ।

4.11 माइक्रो, लघु और मध्यम उद्यम के लिए अधिकार-प्राप्त समिति

भारतीय रिज़र्व बैंक के क्षेत्रीय कार्यालयों में यूनियन वित्त मंत्री द्वारा की गई घोषणा के अनुसार क्षेत्रीय निदेशकों की अध्यक्षता में माइक्रो, लघु और मध्यम उद्यमों पर अधिकार-प्राप्त समितियां गठित की गई हैं । इन समितियों में राज्य स्तरीय बैंकर समिति संयोजक के प्रतिनिधि, दो बैंकों, जिनका राज्य में माइक्रो, लघु और मध्यम उद्यम को वित्तपोषण में सर्वाधिक हिस्सा हो, के वरिष्ठ स्तर के अधिकारी, सिडबी क्षेत्रीय कार्यालय के प्रतिनिधि, राज्य सरकार उद्योग के निदेशक, राज्य में माइक्रो, लघु और मध्यम उद्यम / लघु उद्योग संघ के एक या दो वरिष्ठ स्तर के प्रतिनिधि तथा एसएफसी/एसआइडीसी से एक वरिष्ठ अधिकारी सदस्य के रुप में होंगे। इस समिति की बैठक नियत अवधि पर होगी तथा माइक्रो, लघु और मध्यम उद्यम के वित्तपोषण में हुई प्रगति और रुग्ण माइक्रो, लघु और मध्यम उद्यम इकाइयों के पुनर्वास की भी समीक्षा करेगी। यह क्षेत्र को सहज ऋण उपलब्धता सुनिश्चित करने में आने वाली बाधाओं, यदि कोई हों, के निवारण हेतु अन्य बैंकों / वित्तीय संस्थानों और राज्य सरकार के साथ समन्वय करेगी। ये समितियां समूह /जिला स्तर पर ऐसी ही समितियां गठित करने की आवश्यकता का निर्णय लेंगी।

4.12. एमएसएमई हेतु ऋण पुनर्संरचना तंत्र

(i) लघु और मध्यम उद्यमों को ऋण में वृद्धि करने हेतु माननीय वित्त मंत्री द्वारा की गई घोषणा के भाग के रुप में रिज़र्व बैंक के बैंकिंग परिचालन और विकास विभाग द्वारा माइक्रो, लघु और मध्यम उद्यम क्षेत्र की इकाइयों के लिए एक ऋण पुनर्संरचना तंत्र बनाया गया है तथा इसकी सूचना सभी वाणिज्य बैंकों को दिनांक 8.9.2005 के परिपत्र बैंपविवि.बीपी.बीसी. सं. 34/21.04.132/2005-06 द्वारा दी गई । ये विस्तृत दिशा-निर्देश सभी पात्र माइक्रो, लघु और मध्यम उद्यमों के ऋण की पुनर्संरचना सुनिश्चित करने हेतु जारी किए गए हैं। ये दिशा-निर्देश निम्नलिखित संस्थाओं पर लागू होंगे जो अर्थक्षम या संभाव्य रुप से अर्थक्षम हैं :

क) सभी गैर निगमित माइक्रो, लघु और मध्यम उद्यम चाहे बैंकों को देय राशि का स्तर जो भी हो।

ख) सभी निगमित माइक्रो, लघु और मध्यम उद्यम जिन्हें एक ही बैंक से बैंकिंग सुविधाएं उपलब्ध हैं, चाहे बैंकों को देय राशि का स्तर जो भी हो ।

ग) सभी निगमित माइक्रो, लघु और मध्यम उद्यम जिनका बहुविध/संघीय बैंकिंग व्यवस्था के अंतर्गत निधिक और गैर-निधिक बकाया 10 करोड़ रुपए तक हो ।

घ) ऐसे खाते जिनमें जान-बूझकर की गई चूक, कपट और धांधली हो, इन दिशा-निर्देशों के अंतर्गत पुनर्संरचना के लिए पात्र नहीं होंगे ।

ङ) बैंकों द्वारा "हानि आस्तियां" के रुप में वर्गीकृत खाते पुनर्संरचना के लिए पात्र नहीं होंगे।

माइक्रो, लघु और मध्यम उद्यम सहित सभी ऐसे कारपोरेटों जिनका निधिक और गैर-निधिक बकाया 10 करोड़ रुपए और उससे अधिक हो, के लिए बैंकिंग परिचालन और विकास विभाग ने 10 नवम्बर 2005 के परिपत्र बैंपविवि.सं.बीपी.बीसी. 45/21.04.132/2005-06 द्वारा कारपोरेट ऋण पुनर्संरचना तंत्र पर अलग दिशा-निर्देश जारी किए हैं ।

बैंकों द्वारा एमएसएमई ऋण पुनर्संरचना पर विवेकपूर्ण दिशा-निर्देश तैयार किए गए हैं तथा बैंकिंग परिचालन और विकास विभाग के दिनांक 30 मई 2013 के परिपत्र बैंपविवि.सं.बीपी.बीसी.सं. 99/21.04.132/2012-13 के साथ पठित 27 अगस्त 2008 के परिपत्र बैंपविवि.सं.बीपी.बीसी. 37/21.04.132/2008-09 और 6 जून 2013 के मेल बॉक्स स्पष्टीकरण द्वारा सभी वाणिज्य बैंकों को सूचित किया गया।

ii) रुग्ण एमएसई के पुनर्वास के लिए कार्यदल (अध्यक्ष : डॉ. के. सी. चक्रवर्ती) की सिफारिशों के परिप्रेक्ष्य में दिनांक 4 मई 2009 के हमारे परिपत्र ग्राआऋवि.एसएमइ. एंड एनएफएस.बीसी.सं. 102/06.04.01/2008-09 द्वारा सभी वाणिज्य बैंकों को सूचित किया गया था कि वे :

क) निदेशक मंडल के अनुमोदन से ऋण सुविधाएं प्रदान करने की नियंत्रक ऋण नीति, संभाव्य अर्थक्षम रुग्ण इकाइयों / उद्यमों के पुनर्जीवन के लिए पुनर्संरचना /पुनर्वास नीति तथा एमएसइ क्षेत्र के लिए अनर्जक ऋण की वसूली के लिए नॉन-डिसक्रीशनरी एक बारगी निपटान योजना लागू करें तथा

ख) एमएसई क्षेत्र को समय पर तथा पर्याप्त ऋण उपलब्ध कराने के संबंध में सिफारिशें कार्यान्वित करें।

(iii) बैंकों को सूचित किया गया कि वे उनके द्वारा कार्यान्वित एकमुश्त निपटान योजना बैंक के वेबसाइट पर डालकर तथा अन्य संभावित प्रचार विधि के माध्यम से प्रचार करें। वे उधारकर्ताओं को आवेदन प्रस्तुत करने तथा देय राशि की चुकौती करने के लिए भी पर्याप्त समय दें ताकि पात्र उधारकर्ताओं को योजना के लाभ प्रदान किए जा सके।

4.13. समूह (क्लस्टर) दृष्टिकोण

(i) लघु उद्यम क्षेत्र के केन्द्रित (फोकस्ड) विकास हेतु माइक्रो, लघु और मध्यम उद्यम मंत्रालय, भारत सरकार ने 60 समूहों की पहचान की है। सभी एसएलबीसी संयोजक बैंकों को सूचित किया गया है कि वे अपनी वार्षिक ऋण योजनाओं में माइक्रो, लघु और मध्यम उद्यम मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा पहचाने गए समूहों की ऋण आवश्यकताओं को दर्ज करें ।

गांगुली समिति की सिफारिशों के अनुसार बैंकों को सूचित किया गया है कि वे 4 - सी दृष्टिकोण अपनाकर - अर्थात् ग्राहक फोकस, लागत नियंत्रण, प्रति बिक्री (क्रॉस सेल) तथा जोखिम रोकथाम -पहचाने गए एमएसई समूहों को बैंकिंग सेवाएं उपलब्ध कराने के माध्यम से एमएसई क्षेत्र की विभिन्न आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए संपूर्ण-सेवा दृष्टिकोण प्राप्त करें। उधार हेतु समूह आधारित दृष्टिकोण निम्नलिखित में अधिक लाभकारी होगा:

क. सुपरिभाषित तथा मान्यता प्राप्त समूहों से व्यवहार ;

ख. जोखिम निर्धारण हेतु उपयुक्त जानकारी की उपलब्धता तथा

ग. उधारदाता संस्थानों द्वारा निगरानी ।

समूहों को व्यापार रिकार्ड, प्रतिस्पर्धात्मकता तथा संवृद्धि संभावनाओं और /या अन्य समूह विशिष्ट डाटा के आधार पर पहचाना जा सकता है ।

(ii) वार्षिक नीति वक्तव्य 2007-08 के पैरा 157 में गवर्नर द्वारा की गई घोषणा के अनुसार दिनांक 8 मई 2007 के पत्र ग्राआऋवि.पीएलएनएफएस.सं. 10416/06.02.31/2006-07 द्वारा सभी एसएलबीसी संयोजक बैंकों को सूचित किया गया था कि वे एमएसएमइ क्षेत्र को ऋण प्रदान करने हेतु अपने संस्थागत व्यवस्था की समीक्षा करें, विशेषकर देश के विभिन्न भागों में 21 राज्यों में फैले 388 समूहों में जो युनाइटेड नेशन औद्योगिक विकास संघ (यूएनआइडीओ) द्वारा पहचाने गए हैं। यूएनआइडीओ द्वारा पहचाने गए एसएमइ समूहों की सूची अनुबंध III में दी गई है।

(iii) माइक्रो, लघु और मध्यम उद्यम मंत्रालय ने पारंपरिक उद्योगों के पुनर्सृजन हेतु निधि योजना (एसएफयूआरटीआई) तथा माइक्रो एवं लघु उद्यम समूह विकास कार्यक्रम (एमएसइ-सीडीपी) के अंतर्गत 121 अल्पसंख्यक बहुल जिलों में स्थित समूहों की सूची अनुमोदित की है। तदनुसार, देश के अल्पसंख्यक बहुल जिलों में रहने वाले अल्पसंख्यक समुदायों में से माइक्रो और लघु उद्यमियों के पहचाने गए समूहों को ऋण उपलब्ध कराने हेतु उचित उपाय किये गये हैं।

(iv) एमएसएमई पर प्रधानमंत्री टास्क फोर्स की सिफारिशों के अनुसार बैंकों को विभिन्न एमएसई समूहों में एमएसई केन्द्रित अधिक शाखा कार्यालय खोलने चाहिए जो एमएसई के लिए परामर्श केन्द्रों के रूप में कार्य कर सकें। किसी एक जिले के प्रत्येक अग्रणी बैंक द्वारा कम से कम एक एमएसई समूह को अपनाया जाए।

4.14. ऋण सहलग्न पूंजीगत सब्सिडी योजना (सीएलसीएसएस)

भारत सरकार, माइक्रो, लघु और मध्यम उद्यम मंत्रालय ने निम्नलिखित शर्तों के अधीन माइक्रो और लघु उद्यमों को प्रौद्योगिकी के X प्लान से XI प्लान (2007-12) में उन्नयन के लिए ऋण सहलग्न पूंजीगत सब्सिडी योजना (सीएलसीएसएस) को जारी रखने के लिए अपना अनुमोदन दे दिया है :

  1. योजना के अंतर्गत ऋण की अधिकतम सीमा एक करोड़ रुपए है ।

  2. ऊपर क्रम संख्या (i) में बताई गई अधिकतम सीमा वाले माइक्रो और लघु उद्यमों की इकाइयों के लिए सब्सिडी की दर 15% है ।

  3. स्वीकार्य सब्सिडी की गणना संयंत्र और मशीनरी के खरीदी मूल्य के आधार पर की जाएगी न कि लाभार्थी इकाई को दिए गए ऋण के आधार पर ।

  4. सिडबी और नाबार्ड योजना की कार्यान्वयनकर्ता एजेंसियां बनी रहेंगी ।

4.15. माइक्रो और लघु (एमएसई) उद्यम क्षेत्र को ऋण उपलब्ध कराने के लिए समिति

4.15.1 लघु उद्योग (अब एमएसई) को ऋण पर उच्च स्तरीय समिति की रिपोर्ट (कपूर समिति)

भारतीय रिज़र्व बैंक ने लघु उद्योग क्षेत्र को ऋण की सुपुर्दगी प्रणाली सुधारने तथा कार्य-विधि के सरलीकरण हेतु उपाय सुझाने के लिए एकल व्यक्ति उच्च स्तरीय समिति नियुक्त की थी जिसके अध्यक्ष श्री एस.एल.कपूर, (आइ.ए.एस.,सेवानिवृत्त), भूतपूर्व सचिव, भारत सरकार, उद्योग मंत्रालय थे । समिति ने 126 सिफारिशें की जिनमें लघु उद्योग क्षेत्र को वित्त पोषण से संबधित व्यापक क्षेत्र शामिल हैं । भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा इन सिफारिशों की जांच की गई तथा 88 सिफारिशों को स्वीकार करने का निर्णय लिया गया जिसमें निम्नलिखित महत्वपूर्ण सिफारिशें शामिल हैं :

    1. तदर्थ सीमाएं प्रदान करने हेतु शाखा प्रबंधकों को अधिक शक्तियाँ प्रदान करना ;

    2. आवेदन फार्मों का सरलीकरण ;

    3. ऋण अपेक्षाओं के मूल्यांकन हेतु बैंकों को स्वयं के मानदंड निर्धारित करने की स्वतंत्रता;

    4. और अधिक विशेषीकृत लघु उद्योग शाखाएं खोलना;

    5. संमिश्र ऋण की सीमा में 5 लाख रु. तक की वृद्धि (अब बढ़ाकर 1 करोड़ रु.);

    6. वसूली तंत्र को मजबूत करना ;

    7. बैंकों द्वारा पिछड़े राज्यों के प्रति अधिक ध्यान देना ;

    8. छोटी परियोजनाओं के मूल्यांकन हेतु शाखा प्रबंधकों को प्रशिक्षित करने हेतु विशेष कार्यक्रम ;

    9. बैंक द्वारा ग्राहक शिकायत तंत्र को अधिक पारदर्शी बनाना तथा शिकायतों के निपटान और उनकी निगरानी की प्रक्रिया सरल बनाना ।

सभी अनुसूचित वाणिज्य बैंकों को दिनांक 28 अगस्त 1998 को एक परिपत्र ग्राआऋवि.सं. पीएलएनएफएस. बीसी. सं. 22/06.02.31/98-99 जारी किया गया जिसमें कपूर समिति की सिफारिशों के बारे में सूचित किया गया।

4.15.2 लघु उद्योग क्षेत्र (अब एमएसई ) को संस्थागत ऋण की पर्याप्तता और संबंधित पहलुओं की जाँच हेतु समिति की रिपोर्ट (नायक समिति)

भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा तत्कालीन उप गवर्नर श्री पी.आर.नायक की अध्यक्षता में दिसंबर 1991 में लघु उद्योगों (अब एमएसई) द्वारा वित्त प्राप्त करने से संबंधित मुद्दों की जाँच हेतु एक समिति गठित की गई थी। समिति ने अपनी रिपोर्ट 1992 में प्रस्तुत की। समिति की सभी मुख्य सिफारिशें स्वीकार कर ली गई हैं तथा बैंकों को अन्य बातों के साथ-साथ सूचित किया गया है कि वे -

  1. लघु उद्योग क्षेत्र की ऋण आवश्यकताओं को पूरा करते समय ग्रामीण उद्योगों, अत्यन्त लघु उद्योगों और अन्य छोटी इकाइयों को उसी क्रम में वरीयता दें ।

  2. उन लघु उद्योग (अब एमएसई) इकाइयों को कार्यशील पूंजी ऋण सीमा उनकी अनुमानित वार्षिक आय के कम से कम 20% के आधार पर प्रदान करें ; जिनकी प्रत्येक इकाई की ऋण सीमा 2 करोड़ रु. तक (अब 5 करोड रु. हो गई है ) हो ।

  3. बॉटम-अप आधार पर वार्षिक ऋण बजट तैयार करें ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि लघु उद्योग (अब एमएसई) क्षेत्र की विधिसंगत आवश्यकताएँ पूरी होती हैं ।

  4. लघु उद्योगों (अब एमएसई) की वित्तीय आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए सभी जिलों को एक ही काउंटर पर सभी सुविधाएँ प्रदान करने की योजना उपलब्ध कराई जाए ।

  5. यह सुनिश्चित करें कि ऋण स्वीकृत होने और उसके संवितरण में विलम्ब नहीं होना चाहिए । ऋण प्रस्ताव की ऋण सीमा में कमी / अस्वीकृति होने पर संदर्भ उच्च अधिकारियों के पास भेजा जाना चाहिए ।

  6. ऋण स्वीकृति के लिए बदले में आवश्यक जमाराशि पर जोर न दिया जाए ।

  7. विशेषीकृत लघु उद्योग (अब एमएसई) बैंक शाखाएँ खोलें अथवा बड़ी संख्या में लघु उद्योग (अब एमएसई) उधार खातों वाली शाखाओं को लघु उद्योग (अब एमएसई) विशेषीकृत शाखाओं में परिवर्तित करें ।

  8. रुग्ण लघु उद्योग (अब एमएसई) इकाइयों की पहचान करें और उनमें सुधार के लिए तुरन्त आवश्यक कार्रवाई करें ।

  9. लघु उद्योग (अब एमएसई) उधारकर्ताओं के लिए मानकीकृत ऋण आवेदन फार्म तैयार करें ।

  10. विशेषीकृत शाखाओं में कार्यरत स्टाफ में स्थिति संबंधी परिवर्तन लाने के लिए उन्हें प्रशिक्षण दिया जाए ।

सभी अनुसूचित वाणिज्य बैंकों को दिनांक 2 मार्च 2001 को एक परिपत्र ग्राआऋवि. पीएलएनएफएस. बीसी. सं. 61/06.02.62/2000-01 जारी किया जिसमें नायक समिति की सिफारिशों के बारे में सूचित किया गया।

4.15.3 लघु उद्योगों (अब एमएसई) को ऋण उपलब्ध कराने पर कार्यकारी दल की रिपोर्ट (गांगुली समिति)

भारतीय रिज़र्व बैंक के गवर्नर, द्वारा मौद्रिक और ऋण नीति 2003-04 की मध्यावधि समीक्षा में की गई घोषणा के अनुसार डॉ. ए.एस.गांगुली की अध्यक्षता में "लघु उद्योग क्षेत्र को ऋण उपलब्ध कराने पर कार्यकारी दल" का गठन किया गया ।

समिति ने लघु उद्योग क्षेत्र के वित्तपोषण से संबंधित क्षेत्रों को व्यापक रुप से कवर करते हुए 31 सिफारिशें की हैं । भारतीय रिज़र्व बेंक और बैंकों से संबंधित सिफारिशों की जाँच की गई जिसमें से अभी तक निम्नलिखित 8 सिफारिशें स्वीकार की गईं और बैंकों को उनके कार्यान्वयन हेतु दिनांक 4 सितंबर 2004 के परिपत्र ग्राआऋवि.पीएलएनएफएस.बीसी.28/06.02.31(डब्ल्यूजी)/2004-05 द्वारा सूचित किया गया जो निम्नानुसार है :-

  1. एमएसएमई क्षेत्र के वित्तपोषण के लिए समूह आधारित दृष्टिकोण अपनाना;

  2. छोटे और अत्यंत लघु उद्योगों और उद्यमियों को सेवा देने वाले अग्रणी बैंकों द्वारा गैर सरकारी संस्थाओं के सफल कार्य मॉडल के व्यापक प्रचार के साथ-साथ विशिष्ट परियोजनाओं को प्रायोजित करना ;

  3. पहाड़ी क्षेत्रों की दिक्कतों, बार-बार बाढ़ से परिवहन में बाधा आने जैसी कठिनाइयों को देखते हुए अपने वाणिज्य निर्णय के आधार पर उत्तर पूर्वी क्षेत्रों में कार्यरत बैंकों द्वारा लघु उद्योगों (अब एमएसई) को उच्चतर कार्यकारी पूंजी सीमा स्वीकृत करना ;

  4. बैंकों द्वारा ग्रामीण उद्योग के उन्नयन तथा ग्रामीण कामगारों, ग्रामीण उद्योगों और ग्रामीण उद्यमियों को ऋण उपलब्ध कराने में सुधार के लिए नए उपाय खोजना ;

  5. विदेशी बैंकों द्वारा प्राथमिकताप्राप्त क्षेत्र को निर्धारित लक्ष्य से कम ऋण देने के कारण सिडबी के पास जमा की गई शार्ट फाल की राशि की अवधि तथा उसके ब्याज दर ढाँचे में संशोधन ।

4.15.4 केन्द्रीय वित्त मंत्री द्वारा दिनांक 10 अगस्त 2005 को घोषित लघु और मध्यम उद्यमों को ऋण में वृद्धि हेतु पॉलिसी पैकेज

माननीय वित्त मंत्री, भारत सरकार ने 10 अगस्त 2005 को लघु और मध्यम उद्यमों को ऋण उपलब्धता बढ़ाने हेतु एक पॉलिसी पैकेज की घोषणा की थी। पॉलिसी पैकेज की कुछ विशेषताएँ निम्नानुसार हैं :-

  • लघु और मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) की परिभाषा

  • बैंकों द्वारा माइक्रो, लघु और मध्यम उद्यमों के वित्तपोषण हेतु अपने लक्ष्य स्वयं निर्धारित करना

  • माइक्रो, लघु और मध्यम उद्यम क्षेत्र को ऋणों की लागत को युक्तियुक्त बनाने के उपाय

  • माइक्रो, लघु और मध्यम उद्यम क्षेत्र को औपचारिक ऋण प्रदान करने में वृद्धि के उपाय

  • माइक्रो, लघु और मध्यम उद्यम क्षेत्र को वित्तपोषण हेतु समूह आधारित दृष्टिकोण

  • रिज़र्व बैंक के क्षेत्रीय कार्यालयों में माइक्रो, लघु और मध्यम उद्यमों के लिए अधिकारप्राप्त समितियों का गठन

  • उद्यम की क्रेडिट रेटिंग से सहलग्न करके ऋण की लागत के साथ पारदर्शी रेटिंग प्रणाली अपनाकर माइक्रो, लघु और मध्यम उद्यम क्षेत्र के लिए ऋणों की लागत को युक्तिमुक्त बनाने के उपाय

  • बैंकों की लेनदेन लागत को कम करने के लिए एमएसएमई प्रस्तावों के मूल्यांकन के लिए सिडबी द्वारा विकसित ऋण मूल्यांकन और रेटिंग टूल (कार्ट) जोखिम मूल्यांकन मॉडेल (रैम) और व्यापक रेटिंग मॉडेल से लाभ उठाने पर बैंकों द्वारा विचार किया जाना

  • राष्ट्रीय लघु उद्योग निगम द्वारा लागू की गई क्रेडिट रेटिंग योजना के अन्तर्गत ख्यातिप्राप्त क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों के माध्यम से बैंकों द्वारा एमएसई इकाइयों की रेटिंग कराने पर विचार किया जाना

  • बैंकों के बोर्डों द्वारा तैयार नीति अनुदेशों का व्यापक प्रचार तथा पहुँच आसान बनाना तथा रिज़र्व बैंक द्वारा जारी अनुदेशों / निर्देशों को संबंधित बैंक तथा सिडबी की वेबसाइट में प्रदर्शित करने के साथ-साथ बैंक शाखाओं में प्रमुख स्थानों पर प्रदर्शित करना ।

4.15.5 पॉलिसी घोषणाओं के बाद सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को जारी प्रमुख अनुदेश

केन्द्रीय वित्त मंत्री द्वारा घोषित पॉलिसी पैकेज के आधार पर रिज़र्व बैंक द्वारा सभी सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को जारी प्रमुख अनुदेश निम्नानुसार हैं :

सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को सूचित किया गया था कि वे एसएमइ के निधियन हेतु अपने लक्ष्य निर्धारित करें ताकि वे एसएमइ को ऋण में वर्ष-दर-वर्ष न्यूनतम 20% की वृद्धि प्राप्त कर सकें। उद्देश्य यह है कि वर्ष 2009-10 तक अर्थात् 5 वर्ष की अवधि में एसएमइ क्षेत्र को ऋण की उपलब्धता दुगुनी अर्थात् 2004-05 के 67,600 करोड़ रुपए से बढ़कर 2009-10 तक 135,200 करोड़ रुपए हो जाए।

सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को सूचित किया गया था कि वे उद्यम की क्रेडिट रेटिंग के साथ सहलग्न ऋण की लागत के साथ एक पारदर्शी रेटिंग प्रणाली अपनाएं।

सभी बैंक, प्रति वर्ष अपनी प्रत्येक अर्ध शहरी/शहरी शाखाओं में कम से कम 5 नए लघु /मध्यम उद्यमों को औसतन ऋण कवर उपलब्ध कराने हेतु संयुक्त प्रयास करें।

बैंक लघु उद्यम की प्रधानता वाले समूहों/केन्द्रों में विशेषीकृत एमएसएमई शाखाएं खोलना सुनिश्चित करें ताकि उद्यमियों को आसानी से बैंक ऋण प्राप्त हो जाए।

(इस संबंध में भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा परिपत्र दिनांक 19 अगस्त 2005 का ग्राआऋवि. पीएलएनएफएस बीसी.सं.31/06.02.31/2005-06 तथा दिनांक 25 अगस्त 2005 का ग्राआऋवि. पीएलएनएफएस. बीसी. सं. 35/06.02.31/2005-06 जारी किए गए हैं)

4.15.6 रुग्ण एमएसई के पुनर्वास पर कार्यकारी दल (अध्यक्ष: डॉ. के.सी.चक्रवर्ती)

रुग्ण एमएसई के पुनर्वास पर कार्यकारी दल (अध्यक्ष: डॉ. के.सी.चक्रवर्ती) की सिफारिशों के परिप्रेक्ष्य में सभी वणिज्यिक बैंकों को 4 मई 2009 के हमारे परिपत्र ग्राआऋवि.एसएमई एंड एनएफएस. बीसी. सं. 102/ 06.04.01/2008-09 द्वारा सूचित किया गया कि :

क) वे अपने निदेशक बोर्ड के अनुमोदन से एमएसई क्षेत्र के लिए क्रेडिट सुविधाएं प्रदान करने के संबंध में ऋण नीतियां, संभाव्य रूप से अर्थक्षम रुग्ण यूनिटों के पुनरुज्जीवन के लिए पुनर्संरचना/ पुनर्वास नीतियां और गैर निष्पादक ऋणों की वसूली के लिए एकबारगी निपटान योजना स्थापितकरें और

ख) उक्त सिफारिशों का ऊपर उल्लिखित परिपत्र में वर्णित प्रकार से एमएसई क्षेत्र को समय पर तथा पर्याप्त ऋण उपलब्ध कराते हुए कार्यान्वयन करें

उपर्युक्त 4 मई 2009 के परिपत्र द्वारा बैंकों को अन्य बातों के साथ-साथ उन सिफ़ारिशों को कार्यान्वित करने पर विचार करने के लिए भी सूचित किया गया था कि 2 करोड़ रुपए तक के सभी अग्रिमों के मामले में ऋण, स्कोरिंग मॉडल के आधार पर दिए जाएं। बैंकों को 15 अप्रैल 2014 के परिपत्र बैंपविवि. डीआईआर.बीसी.सं.106 /13.03.00/ 2013-14 द्वारा यह भी सूचित किया गया कि वे एमएसई उधारकर्ताओं के ऋण प्रस्तावों के मूल्यांकन में बोर्ड अनुमोदित क्रेडिट स्कोरिंग मॉडल का प्रयोग करने की दृष्टि से एमएसई क्षेत्र को क्रेडिट सुविधाएं प्रदान करने के संबंध में लागू अपनी ऋण नीति की समीक्षा करें।

4.15.7 माइक्रो, लघु और मध्यम उद्यम पर प्रधान मंत्री का टास्क फोर्स

माइक्रो, लघु और मध्यम उद्यम (एमएसएमई) द्वारा उठाए विभिन्न मामलों पर विचार करने हेतु भारत सरकार द्वारा एक उच्च स्तरीय टास्क फोर्स (अध्यक्षःश्री टी.के.ए.नायर) गठित किया गया था। टास्क फोर्स ने एमएसएमई के कार्य अर्थात् ऋण, विपणन, श्रम, निकास नीति, मूलभूत सुविधाएं/प्रौद्योगिकी/ कौशल उन्नयन तथा कर-निर्धारण से संबंधित विभिन्न उपायों की सिफारिश की। व्यापक सिफारिशों में वे उपाय जिन पर तुरंत कार्रवाई आवश्यक है तथा विधि और नियामक ढांचा सहित मध्यावधि संस्थागत उपायों भी तथा उत्तर-पूर्वी राज्यों और जम्मू और कश्मीर के लिए सिफारिशें शामिल हैं।

बैंकों को टास्क फोर्स द्वारा की गई सिफारिशों को ध्यान में रखकर एमएसई क्षेत्र, विशेषतः माइक्रो उद्यमों को ऋण उपलब्धता बढ़ाने हेतु प्रभावी कदम उठाने हेतु प्रेरित किया जाता है।

एमएसएमई पर प्रधानमंत्री टास्क फोर्स की सिफारिशों के कार्यान्वयन की सूचना देते हुए सभी अनुसूचित वाणिज्य बैंकों को दिनांक 29 जून 2010 का परिपत्र ग्राआऋवि.एसएमई एंड एनएफएस. बीसी.सं. 90/06.02.31/2009-10 जारी किया गया।

माइक्रो, लघु और मध्यम उद्यम पर प्रधानमंत्री टास्क फोर्स की रिपोर्ट माइक्रो, लघु और मध्यम उद्यम मंत्रालय की वेबसाइट (msme.gov.in) पर उपलब्ध है।

4.15.8 माइक्रो और लघु उद्यम (एमएसई) हेतु ऋण गारंटी योजना की समीक्षा करने हेतु कार्य-दल

भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा सीजीटीएमएसई की ऋण गारंटी योजना के कार्य की समीक्षा करने, उसके प्रयोग को बढ़ाने के उपाय सुझाने तथा एमएसई को संपार्श्विक रहित ऋण में वृद्धि को सुगम बनाने हेतु श्री वी.के.शर्मा, कार्यपालक निदेशक की अध्यक्षता में एक कार्य-दल गठित किया गया था।

कार्य-दल की सिफारिशों में अन्य बातों के साथ-साथ माइक्रो और लघु उद्यम (एमएसई) क्षेत्र को संपार्श्विक रहित ऋण सीमा को 5 लाख रुपए से 10 लाख रुपए तक अनिवार्यतः दुगुना करना तथा बैंकों के मुख्य कार्यपालक अधिकारियों को आदेश देना कि वे सीजीएस कवर का उपभोग करने हेतु शाखा स्तर के पदाधिकारियों को प्रभावशाली ढंग से प्रोत्साहित करें तथा उनके फील्ड स्टाफ आदि का मूल्यांकन करने में इससे संबंधित कार्य-निष्पादन को एक मानदंड बनाए, शामिल है जो सभी बैंकों को सूचित किया गया।

सभी अनुसूचित वाणिज्य बैंकों को दिनांक 6 मई 2010 का परिपत्र ग्राआऋवि.एसएमई एंड एनएफएस. बीसी.सं. 79/06.02.31/2009-10 जारी किया गया जिसके द्वारा यह अनिवार्य किया गया कि वे एमएसई क्षेत्र की इकाइयों को प्रदान 10 लाख रूपए तक के ऋण के मामलों में संपार्श्विक जमानत स्वीकार न करें तथा यह सूचित किया गया कि वे सीजीएस कवर का उपभोग करने हेतु शाखा स्तर के पदाधिकारियों को प्रभावशाली ढंग से प्रोत्साहित करें जिसमें उनके फील्ड स्टाफ के मूल्यांकन में इससे संबंधित कार्य निष्पादन को को एक मानदंड बनाना शामिल है।

दल की अन्य सिफारिशों को कार्यान्वित करने के लिए आवश्यक कार्रवाई की जा रही है जिससे उक्त गारंटी योजन के उपयोग में बढ़ोतरी होगी तथा वर्तमान में शामिल एवं छोड दिए गए एमएसई को दिए जानेवाले क्रेडिट की गुणवत्ता एवं मात्रा बढ़ाई जाने में सुविधा होगी और इस तरह निरंतर समावेशी वृद्धि की स्थिति बनेगी।

4.16 भारतीय बैंकिंग संहिता और मानक बोर्ड (बीसीएसबीआई)

भारतीय बैंकिंग संहिता और मानक बोर्ड ने माइक्रो और लघु उद्यमों के लिए बैंक प्रतिबध्दता की संहिता तैयार की है । यह स्वैच्छिक संहिता है जो बैंको द्वारा, जब वे माइक्रो लघु और मघ्यम उद्यमों से संव्यवहार करते हैं, माइक्रो, लघु और मध्यम उद्यम (एमएसएमइडी ) अधिनियम, 2006 में परिभाषित किए गए अनुसार, अपनाए जाने के लिए बैंकिंग संव्यवहार के न्यूनतम मानक तय करती है । यह माइक्रो और लघु उद्यमों को संरक्षण प्रदान करती है और यह बैंकों को यह बताती हे कि माइक्रो और लघु उद्यमों के साथ संव्यवहार करते समय उनके दैनिक परिचालन में और वित्तीय समस्याओं की घड़ी में बैंकों से क्या अपेक्षा की गई हैं ।

यह संहिता भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा विनियामक और पर्यवेक्षी अनुदेशों को न तो परिवर्तित करती है और न ही अधिक्रमित करती है और बैंक, भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा समय-समय पर जारी अनुदेशों/दिशा निर्देशों का पालन करते रहेंगे।

4.16.1 बीसीएसबीआई संहिता के उद्देश्य

यह संहिता इसलिए तैयार की गई है कि यह:-

क) सक्षम बैंकिंग सेवाओं तक माइक्रो और लघु उद्यम की पहुंच को आसान बनाने के लिए उन्हें एक सकारात्मक बल प्रदान करती हैं ।

ख) माइक्रो, लघु और मध्यम उद्यमों के साथ लेनदेन करने में न्यूनतम मानक तय करके अच्छे और उचित बैंकिंग संव्यवहारों का प्रसार करती है ।

ग) पारदर्शिता बढ़ाती है ताकि सेवाओं से यथोचित रुप से क्या अपेक्षित है इसे भलिभांति समझा जा सके ।

घ) प्रभावी संप्रेषणीयता के जरिए कारोबार की समझ में सुधार लाती है ।

ड.) उच्चतर परिचालनगत मानकों को प्राप्त करने के लिए स्पर्धा के जरिए बाजारी शक्तियों को प्रोत्साहित करती है ।

च) माइक्रो और लघु उद्यमों और बैंकों के बीच स्वच्छ और सौहार्दपूर्ण संबंध बढ़ाने के साथ-साथ बैंकिंग आवश्यकताओं के प्रति सामायिक और त्वरीत प्रतिसाद सुनिश्चित करती है ।

छ) बैंकिंग प्रणाली में विश्वास को बढ़ाती है ।

संहिता का पूरा पाठ बीसीएसबीआई की वेबसाइट (www.bs.sbi.org.in) पर उपलब्ध है ।

 
 
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