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डॉ. रघुराम जी. राजन, गवर्नर का पहला द्वि-मासिक मौद्रिक नीति वक्तव्य, 2014-15

01 अप्रैल 2014

डॉ. रघुराम जी. राजन, गवर्नर का पहला द्वि-मासिक मौद्रिक नीति वक्तव्य, 2014-15

भाग ए : मौद्रिक नीति

मौद्रिक और चलनिधि उपाय

वर्तमान तथा उभरती हुई समष्टि आर्थिक स्थिति के आकलन के आधार पर यह निर्णय लिया गया है कि :

  • चलनिधि समायोजन सुविधा (एलएएफ) के अंतर्गत नीति रिपो दर में कोई परिवर्तन किए बिना इसे 8.0 प्रतिशत रखा जाए।

  • अनुसूचित बैंकों के आरक्षित नकदी निधि अनुपात (सीआरआर) को निवल मांग और मीयादी देयताओं (एनडीटीएल) के 4.0 प्रतिशत पर अपिरिवर्तित रखा जाए।

  • 7-दिवसीय और 14-'दिवसीय मीयादी देयताओं के अंतर्गत उपलब्ध चलनिधि को बैंकिंग प्रणाली की निवल मांग और मीयादी देयताओं के 0.5 प्रतिशत से बढ़ाकर 0.75 प्रतिशत किया जाए तथा चलनिधि समायोजन सुविधा के अंतर्गत ओवर-नाईट रिपो में उपलब्ध कराई गई चलनिधि को बैंक-वार निवल मांग और मीयादी देयताओं के 0.5 प्रतिशत से घटाकर तत्काल प्रभाव से 0.25 प्रतिशत किया जाए।

इसके परिणामस्वरूप चलनिधि समायोजन सुविधा के अंतर्गत प्रत्यावर्तनीय रिपो दर 7.0 प्रतिशत और सीमांत स्थायी सुविधा (एमएसएफ) दर तथा बैंक दर 9.0 प्रतिशत पर अपरिवर्तित बनी रहेगी।

आकलन

जनवरी 2014 की तीसरी तीमाही समीक्षा के बाद वैश्विक गतिविधि में ऐसा प्रतीत होता है कि अमरीका, यूके और जापान में धीमी वृद्धि में सुधान आया है, यूरो क्षेत्र में मंदी जारी है और अनिश्चित बाहरी मांग वातावरण के साथ-साथ स्थानीय चक्रीय और संरचनात्मक बाध्यताओं द्वारा अवरूद्धता के कारण उभरती और विकासशील अर्थव्यवस्थाओं में रूकी हुई तेज़ी लौटी है। कई उभरते हुए बाज़ारों के लिए बाहरी वित्तीय स्थितियों में और कड़ाई तथा पूंजी प्रवाहों में नई अस्थिरता उनकी संभावनाओं के प्रति सबसे बड़े जोखिम हैं। आगे जाकर वर्ष की शेष अवधि में जोखिमों को प्रारंभिक स्तर की ओर जाने के साथ वैश्विक वृद्धि में मज़बूती संभावित है।

घरेलू स्तर पर वास्तविक सकल घरेलू उत्पाद वृद्धि में सेवाओं जैसेकि व्यापार, होटल, परिवहन और संचार तथा भूसंपदा और कारोबारी सेवाओं की वित्तीय सहायता में गतिवधि में कुछ मज़बूती के साथ वर्ष 2013-14 की तीसरी तिमाही में सुधार जारी है। हाल के आंकड़ों में कुछ सकारात्मक गतिविधि के बावजूद औद्योगिक गतिविधि अर्थव्यवस्था पर उपभोक्ता स्थायी वस्तुओं के साथ पूंजीगत वस्तुओं के उत्पादन में कमी में परिलक्षित उपभोग और निवेश मांग दोनों में बढ़ते अंतर के साथ दबाव डाल रही है। अगली तिमाहियों में वर्ष 2013 में मज़बूत कृषि उत्पादन के द्वारा उपलब्ध प्रोत्साहन में कमी आ सकती है। तथापि, वर्ष 2014 के लिए दक्षिणी-पश्चिमी मानसून की संभावना अनिश्चित दिखाई देती है। औद्योगिक गतिविधि, निर्यात तथा सेवाओं की विभिन्न श्रेणियों में मंदी, उत्पादकता और प्रतिस्पर्धा को तेज़ करने की जरूरत को रेखांकित करती है।

उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) द्वारा मापी गई खुदरा मुद्रास्फीति खद्यान्न कीमतों में तेज़ अवस्फीति द्वारा कम होकर फरवरी 2014 में लगातार तीसरे महीने में कम हुई है। यद्यपि, फलों, दूध और उसके उत्पाद की कीमतों में तेज़ी आ रही है। तथापि, खाद्यान्न और ईंधन को छोड़कर खुदरा मुद्रास्फीति लगभग 8 प्रतिशत पर बनी हुई है। इससे यह प्रस्तावित होता है कि कुछ मांग दबाव अभी भी कार्यरत हैं।

पण्य वस्तु कारोबार घाटा पिछले वर्ष अपने स्तर से अप्रैल-फरवरी 2013-14 में गैर-तेल आयातों में भारी गिरावट के कारण 22 प्रतिशत कम हुआ है। वर्ष के दौरान व्यापार घाटे में तेज़ी से होती हुई कमी ने चालू खाता घाटे को वर्ष 2013-14 की तीसरी तिमाही में कम करते हुए सकल घरेलू उत्पाद के 0.9 प्रतिशत तक ला दिया है। संपूर्ण वर्ष के लिए चालू खाता घाटा सकल घरेलू उत्पाद के लगभग 2.0 प्रतिशत तक रहने की आशा है। तथापि, अभी हाल में अंशत: सहभागी देशों में मांग में मंदी के साथ-साथ पेट्रौलियम उत्पादों तथा रत्न और आभूषणों के निर्यात की कीमतों में नरमी (तेल तथा स्वर्ण आयात की कीमतों में कमी के कारण) के कारण निर्यात वृद्धि मंद हुई है। यह देखना बाकी है कि क्या वैश्विक वृद्धि में एक बार तेज़ी आने के कारण निर्यात में मंदी जारी रहती है। फरवरी में पोर्टफोलियों प्रवाहों में वापसी हुई है क्योंकि निवेशकों ने अमरीकी फेडरल द्वारा सुविधाओं को बंद करने के प्रभावों में व्यापक रूप से मूल्य निर्धारण किया है तथा उभरते हुए बाज़ारों में पुन: आबंटनों के साथ आर्थिक और भौगोलिक-राजनीतिक गतिविधियों के प्रति कार्रवाई की है। पोर्टफोलियों प्रवाहों के रूप में जारी अंतर्वाहों के साथ विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (एफडीआई) और बाह्य वाणिज्यिक उधारों के साथ बाहरी वित्तीय सहायता स्थितियां सुविधाजनक हुई हैं। मार्च के दौरान सार्वजनिक क्षेत्र की तेल विपणन कंपनियों द्वारा रिज़र्व बैंक को अपनी विदेशी मुद्रा देयताओं की चुकौती से बढ़े हुए अंतर्वाहों ने प्रारक्षित निधियों में बढ़ोतरी लाई है।

चलनिधि की ओर भारी मुद्रा मांग तथा मार्च के मध्ये से कर बर्हिवाहों से होने वाले दबावों को देखते हुए 14 मार्च को `500 बिलियन की 21-दिवसीय मीयादी रिपो तथा 19 और 26 मार्च को `100 बिलियन की सात-दिवसीय मीयादी रिपो निलामियों आयोजित की गई जो 21 मार्च को `400 बिलियन की 14-दिवसीय मीयादी रिपो की नियमित नीलामी के अतिरिक्त थी। वार्षिक लेखा बंदी के दौरान बैंकिंग परिचालनों को अबाधित सुविधा प्रदान करने के लिए 28 मार्च को `200 बिलियन की अधिसूचित राशि के लिए एक 5-दिवसीय मीयादी रिपो आयोजित की गई। इस प्रयोजन के लिए 29 और 31 मार्च (छुट्टी) को सीमांत स्थायी सुविधा तक पहुंच की अनुमति भी दी गई। रिज़र्व बैंक चलनिधि स्थितियों की निगरानी करता रहेगा तथा उत्पादक क्षेत्रों को पर्याप्त ऋण प्रवाह सुनिश्चित करने के लिए चलनिधि की सक्रियता से व्यवस्था करेगा।

नीति रुझान और औचित्य

दिसंबर 2013 से सब्जी की कीमतों में आशा से तीव्र अवस्फीति ने हेडलाईन मुद्रास्फीति में भारी गिरावट में सहायता की है। भविष्य में सब्जी की कीमतों ने अपनी मौसमी उतार में प्रवेश किया है तथा इसमें और नरमी संभावित है। इस बीच खाद्यान्न और ईंधन को छोड़कर उपभोक्ता मूल्य सूचकांक मुद्रास्फीति नरम बनी हुई है।

संभावित एल निनो प्रभावों के कारण सामान्य मानसून की अपेक्षा कम मानसून से प्रभावित जनवरी 2015 तक 8 प्रतिशत की उपभोक्ता मूल्य सूचकांक मुद्रास्फीति के केंद्रीय अनुमान के प्रति जोखिम हैं; कृषिगत वस्तुओं के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्यों के निर्धारण और अन्य लागू कीमतों खासकर ईंधन, उर्वरक और विद्युत के निर्धारण पर अनिश्चितता; राजकोषीय नीति की संभावना; भौगोलिक राजनीतिक गतिविधियां और अंतराष्ट्रीय पण्य वस्तु कीमतों पर उनके प्रभाव में अनिश्चितता है। जून-नवंबर 2013 के दौरान उच्च मुद्रास्फीति के मूल प्रभावों के द्वारा उत्पन्न उपभोक्ता मूल्य सूचकांक मुद्रास्फीति पर शुरूआती सांख्यिकीय दबाव भी होंगे। इन मूल प्रभावों सहित किन्हीं चलायमान प्रभावों पर ध्यान देना भी महत्वपूर्ण है जो अस्थायी रूप से वर्ष 2014 के दौरान (सारणी 1) हेडलाइन मुद्रास्फीति को नरम बना सकते हैं।

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रिज़र्व बैंक का नीतिगत रुख आर्थव्यवस्था को अवस्फीतिकारी गिरावट के मार्ग पर रखने का होगा जिसका लक्ष्य जनवरी 2015 में 8 प्रतिशत और जनवरी 2016 तक 6 प्रतिशत उपभोक्ता मूल्य सूचकांक मुद्रास्फीति प्राप्त करने का है। वर्तमान समय में नीति दर को बरकरार रखना उचित होगा और साथ ही सितंबर 2013 से जनवरी 2014 के दौरान दरों में हुई वृद्धि को अवसर देना चाहिए ताकि वे अर्थव्यवस्था में अपने ढंग से कार्य कर सकें। इसके अलावा यदि मुद्रास्फीति अपेक्षित अवनति के मार्ग पर अग्रसर रहती है तो आने वाले समय में नीति को और अधिक सख्त बनाने की अभी आशा नहीं है।

अपेक्षित मुद्रास्फीति परिणामों के आधार पर वास्तविक सकल घरेलू उत्पाद वृद्धि की 2013-14 में 5 प्रतिशत से थोड़ी कम और 2014-15 में 5-6 प्रतिशत की सीमा के बीच रहने की अपेक्षा है यद्यपि, 5.5 प्रतिशत के केंद्रीय आंकलन के संबंध में अधोगामी जोखिम होगा (सारणी 2)। अभी तक मुख्य संकेतक उद्योग और सेवाओं में किसी भी प्रकार के सतत पुनरुत्थान की ओर संकेत नहीं दे रहे हैं एवं कृषि क्षेत्र के लिए परिदृश्य, मानसून के समय से आने एवं इसके विस्तार के ऊपर निर्भर है। जैसे ही वैश्विक आर्थव्यवस्था में सुधार होगा,घरेलू आपूर्ति संबंधी मार्गावरोध में राहत प्रदान करने एवं पहले से अनुमोदित किन्तु अवरुद्ध परियोजनाओं के क्रियान्वयन में प्रगति विकास के परिदृश्य को बेहतर बनाएगी।

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चलनिधि प्रबंधन और मीयादी रिपो के माध्यम से चलनिधि प्रबंधन का सक्रिय संचालन करने के लिए ओवरनाइट “गारंटीड –एक्सेस” विंडोज को महत्व न देने संबंधी डॉक्टर उर्जित आर. पटेल की समिति की सिफ़ारिशों के अनुपालन में भारतीय रिज़र्व बैंक ने यह निर्णय लिया है कि रिज़र्व बैंक की ओर से मीयादी रिपो के संबंध में बाज़ार की पहुँच के आनुपातिक विस्तार की पूरी तरह से प्रतिपूर्ति करते हुए चलनिधि समायोजन सुविधा के अंतर्गत ओवरनाइट रिपो तक पहुँच को और भी अधिक कम किया जाए। इसका प्राथमिक उद्देश्य यह है कि ब्याज दर परिदृश्य में नीति दबावों का प्रसार हो। मीयादी रिपो अंतर्निहित चलनिधि परिस्थितियों के उपयोगी संकेतक के रूप में उभरा है। यह बाजार के सहभागियों को लंबे समय के लिए चलनिधि रखने की महत्व भी देता है, तदनुसार बाज़ारों में मीयादी लेनदेन करने की, विभिन्न वित्तीय उत्पादों के मूल्यन में बाजार आधारित बेंचमार्क बनाने के संबंध में एवं नकद/ट्रेजरी प्रबंधन में सुधार करने की भी प्रेरणा मिलती है।

मार्च में चलनिधि परिस्थितियां सीमित हुई थीं जो कि आंशिक रूप से बैंकों द्वारा वर्ष की समाप्ति पर की जाने वाली “विंडो ड्रेसिंग” के कारण था, यद्यपि रिज़र्व बैंक द्वारा किये गए चलनिधि के असाधारण अंतर्वाह ने इस कमी को कम किया है। रिज़र्व बैंक इस तरह के रिवाजों को कम करने के लिए उपाय सुझाएगा।

द्वितीय अर्ध-मासिक मौद्रिक नीति पॉलिसी स्टेटमेंट मंगलवार, 3 जून, 2014 को जारी किया जाएगा।

भाग ख : विकास और विनियामक नीतियाँ

वक्तव्य का यह भाग रिज़र्व बैंक द्वारा हाल के नीति वक्तव्य में घोषित किए गए विभिन्न विकासात्मक और विनियामक उपायों की प्रगति की समीक्षा करता है एवं नए उपाय भी सुझता है।

अक्तूबर 2013 में घोषित मौद्रिक नीति 2013-14 की दूसरी तिमाही की समीक्षा में रिज़र्व बैंक ने अपने विकासात्मक और विनियामक उपायों को दिशा देने के लिए एक पाँच स्तंभों वाला ढांचा तैयार किया। इस ढांचे के अंतर्गत उपायों के क्रियान्वयन में काफी प्रगति हुई है।

मौद्रिक नीति ढांचे को संशोधित करने एवं इसे सशक्त बनाने के लिए विशेषज्ञ समिति (अध्यक्ष: डॉक्टर उर्जित आर. पटेल) की कुछ सिफ़ारिशों को कार्यान्वित कर दिया गया है जिसमें नए उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (संयुक्त) को मुद्रास्फीति, अवस्फीतिकरण के लिए अवनति मार्ग की स्पष्ट पहचान, अर्ध मासिक मौदृक नीति चक्र को अपनाना, स्थायी रिपो दर पर एलएएफ़ के अंतर्गत ओवरनाइट चलनिधि तक पहुँच में क्रमिक रूप से कमी और मीयादी रिपो के माध्यम से चलनिधि तक पहुँच में तदनुरूपी वृद्धि के प्रमुख उपाय के रूप में अपनाया गया है।

बैंकिंग संरचना जो कि दूसरा स्तम्भ है, को सशक्त बनाने के लिए उच्च स्तरीय परमर्शदात्री समिति (अध्यक्ष: डॉक्टर बिमल जालान) ने हाल ही में नए बैंकों को लाइसेन्स प्रदान करने के संबंध में रिज़र्व बैंक को अपनी सिफ़ारिशें प्रस्तुत की हैं। रिज़र्व बैंक सैद्धान्तिक रूप में नए लाइसेंसों के लिए अनुमोदन की घोषणा चुनाव आयोग से परामर्श के बाद ही देगा। इसके तुरंत बाद अगस्त 2013 में रिज़र्व बैंक की वेबसाइट पर उपलब्ध कराया गया “भारत में बैंकिंग संरचना-अगला रास्ता” पर चर्चा पत्र के आधार पर एवं हाल ही की लाइसेंसिंग प्रक्रियाओं से सीखे गए अनुभवों का प्रयोग करते हुए,रिज़र्व बैंक ऑन-टैप लाइसेंसिंग और साथ ही साथ अलग-अलग बैंक लाइसेंसेसों के ढांचे पर कार्य करना आरंभ कर देगा। इसका आशय है वित्तीय स्थिरता को बरकरार रखते हुए बैंकिंग प्रणाली में सहभागियों की विविधता और दक्षता को बढ़ाना। रिज़र्व बैंक बैंकिंग विलयनों को भी आमंत्रित करेगा बशर्ते प्रतिस्पर्धा और स्थायित्व से समझौता न किया जाए।

कई विनियामक एवं पर्यवेक्षी उपायों में प्रगति हुई है। घरेलू प्रणालीगत रूप से महत्वपूर्ण बैंकों (डी-एसआईबी) के साथ कार्य करने संबंधी मसौदा ढांचे के संबंध में प्राप्त टिप्पणियों/प्रतिसूचना के आधार पर अंतिम ढांचे को मई 2014 माह के अंत तक जारी किए जाने का प्रस्तवा है। जैसा कि,बासेल समिति द्वारा विहित चलनिधि व्याप्ति अनुपात (एलसीआर) 1 जनवरी 2015 से मानक हो जाएगा, यह प्रस्तावित है कि यह बासेल III एलसीआर और चलनिधि जोखिम निगरानी उपायों से संबन्धित दिशानिर्देश जारी करेगा। बैंकिंग पर्यवेक्षण पर बासेल समिति (बीसीबीएस) के सिद्धांतों एवं उसके बाद की वैश्विक गतिविधियों के अनुसरण में स्ट्रेस टेस्टिंग पर अद्यतन दिशानिर्देश दिसंबर 2013 में जारी किए गए। अरक्षित विदेशी मुद्रा व्ययों सहित कार्पोरेटों को दिये जाने वाले बैंक अग्रिमों के संबंध में कैपिटल एवं प्रोविजनिंग अपेक्षाओं को जनवरी 2014 में विनिर्दिष्ट किया गया था।

भारत में प्रतिचक्रीय पूंजी बफर ढांचे को परिचालित करने के लिए गठित आंतरिक कार्य समूह (अध्यक्ष: श्री बी महापात्र) की प्रारूप रिपोर्ट टिप्पणियों के लिए दिसंबर 2013 में रिजर्व बैंक की वेबसाइट पर डाली गई थी। प्राथमिकता प्राप्त क्षेत्रों सहित विभिन्न क्षेत्रों में अपने एक्सपोज़र का सक्रिय रूप से प्रबंध करने के लिए बैंकों को प्रोत्साहित करने हेतु लघु कारोबार और कम आय वाले परिवारों (अध्यक्ष: डॉ. नचिकेत मोर) के लिए व्यापक वित्तीय सेवा समिति की सिफारिशों के आधार पर यह प्रस्तावित है कि जून 2014 के अंत तक वित्तीय विवरणों में निश्चित अतिरिक्त प्रकटीकरण अपेक्षाएं निर्धारित की जाएं।

आस्ति गुणवत्ता के बारे में उद्योग-वार चिंता और बैंकों के निष्पादन/लाभप्रदता पर इसके परिणामी प्रभाव के पालन में रिज़र्व बैंक ने भारत में बासल III के पूर्ण कार्यान्वयन के लिए परिवर्तन अवधि 31 मार्च 2018 की जगह 31 मार्च 2019 तक बढ़ा दी है। इससे भारत में बासल III का पूर्ण कार्यान्वयन भी अंतर्राष्ट्रीय रूप से सहमत तारीख 1 जनवरी 2019 के निकट हो जाएगा।

रिज़र्व बैंक ने अधिसूचित वाणिज्यिक बैंकों (एससीबी) के लिए जोखिम आधारित पर्यवेक्षण (आरबीएस) के लिए कदम बढ़ाए हैं, यह अधिक तैयार बैंकों से शुरू किया गया है। चरण I के पूरे होने से प्राप्त अनुभव और बैंकों से जोखिम आधारित पर्यवेक्षण ढ़ांचे पर प्राप्त प्रतिसूचना के आधार पर इस ढ़ांचे को ठीक किया जा रहा है। बैंकों को भी सूचित किया जा रहा है कि वे अपनी जोखिम प्रबंध संरचना, पद्धतियों, संबंधित प्रक्रियाओं और प्रबंध सूचना प्रणालियों (एमआईएस) का आकलन करें ताकि चरण III में जोखिम आधारित पर्यवेक्षण में स्विच किया जा सके।

वित्तीय बाजारों को व्यापक और गहन बनाने पर तीसरे स्तंभ के संबंध में खुदरा निवेशकों के लिए मुद्रास्फीति सूचकांकित राष्ट्रीय बचत प्रतिभूतियां (आईआईएनएसएस) दिसंबर 2013 में जारी की गईं। निवेशक मांग में विस्तार के लिए कुछ डिज़ाइन बदलावों की जरूरत है। व्यक्तिगत निवेशकों और ट्रस्टों की सीमा में वृद्धि जैसे कुछ बदलाव कार्यान्वित किए जा चुके हैं। कारोबार योग्यता (और इसके परिणामस्वरूप, पूंजी लाभ कर के लिए सूचकांकन का लाभ) नियमित कूपन प्रवाहों के साथ प्रतिभूतियों का निर्गम जैसे अन्य बदलावों पर विचार किया जा रहा है। नकदी निपटान वाले एकल बांड 10 वर्षीय ब्याज दर फ्यूचर्स (आईआरएफ) शेयर बाजारों द्वारा जनवरी 2014 में शुरू किए गए। रिज़र्व बैंक जल्दी ही दिशानिर्देश जारी करेगा जो बैंकों को कंपनी बांडों के लिए आंशिक ऋण संवर्धन प्रदान करने की अनुमति देंगे। जैसाकि सरकारी प्रतिभूतियों और ब्याज दर डेरिवेटिव बाजारों में चलनिधि बढ़ाने पर कार्यसमूह (अध्यक्षः आर. गांधी) द्वारा सिफारिश की गई है, रिज़र्व बैंक प्राथमिक व्यापारियों को विशिष्ट प्रतिभूतियां आवंटित कर तथा प्राथमिक व्यापारियों के निष्पादन का आकलन करने के लिए उचित ढ़ांचे के साथ निरंतर कीमत उपलब्धता को सुनिश्चित करने के लिए प्राथमिक व्यापारियों (पीडी) के लिए बाजार रचना योजना शुरू करने का प्रस्ताव कर रहा है। यह उचित जोखिम नियंत्रण उपायों के अधीन “रिपो वाली” सरकारी प्रतिभूतियों की सीमित पुनःरिपो/पुनःबंधक की संभावना की भी जांच करेगा।

वित्तीय बेंचमार्क समिति (अध्यक्षः श्री पी. विजय भास्कर) ने अपनी रिपोर्ट फरवरी 2014 में प्रस्तुत की। समिति ने प्रमुख भारतीय रुपया ब्याज दर के संबंध में अनेक उपायों/सिद्धांतों और उनकी गुणवत्ता को सुदृढ़ करने, उनके निर्धारण की पद्धति तथा अभिशासन ढ़ांचे के लिए विदेशी विनिमय बेंचमार्क अपनाने की सिफारिश की है। बैंकों और प्राथमिक व्यापारियों को सूचित किया है कि वे रिज़र्व बैंक की पर्यवेक्षी समीक्षा के अधीन बेंचमार्क अपनाने पर अपनी अभिशासन ढ़ांचों को सुदृढ़ करें। अन्य सिफारिशें स्थायी आय, मुद्रा बाजार और डेरिवेटिव संघ (फिम्मडा) तथा भारतीय विदेशी मुद्रा व्यापारी संघ के परामर्श से कार्यान्वित की जाएंगी।

रिज़र्व बैंक विदेशी निवेशकों के लिए प्रवाहों की अस्थिरता के जोखिम को कम करते हुए आसान प्रवेश के लिए कार्य करता रहेगा। घरेलू शेयर बाजारों में मुद्रा व्यापारित करेंसी फ्यूचर्स का उपयोग करते हुए विदेशी संस्थागत निवेशकों को अपने करेंसी जोखिम का बचाव करने की अनुमति की पद्धतियों को भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी) के परामर्श से अंतिम रूप दिया जा रहा है। ऋण लिखतों में विदेशी निवेशकों के लिए बचाव सुविधाओं में संवर्धन हेतु यह प्रस्तावित है कि उन्हें अगले 12 महीनों के दौरान देय कुपन प्राप्तियों के संरक्षण की अनुमति दी जाए। संविदात्मक एक्सपोज़र के मामले में रद्द की गई संविदाओं की पूरी तरह से पुन: बुकिंग लागू हो गई है। इसके अतिरिक्त यह प्रस्ताव है कि सभी निवासी व्यक्तियों, फर्मों तथा वास्तविक विदेशी मुद्रा एक्सपोज़र वाली कंपनियों को निश्चित शर्तों के अधीन घोषणा पर 2,50,000 अमरीकी डॉलर तक विदेशी मुद्रा डेरिवेटिव संविदा बुक करने की अनुमति दी जाए।

सरलीकृत विदेशी संविभाग निवेशक (एफपीआई) व्यवस्था के लिए विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम (फेमा) के अंतर्गत संशोधित विनियम मार्च 2014 में अधिसूचित किए गए हैं। रिज़र्व बैंक विदेशी संविभाग निवेशकों द्वारा बैंक खाते खोलने के लिए अपने ग्राहक को जानें (केवाईसी) प्रक्रियाओं को सरल बनाने का प्रस्ताव भी करता है। रिज़र्व बैंक ऋण बाज़ारों में एफपीआई निवेश के लिए सीमाओं को तर्कसंगत बनाकर उनका विस्तार भी कर रहा है। लंबी परिपक्वता प्रवाहों को प्रोत्साहित करने के लिए खज़ाना बिलों में निवेश सीमा अप्रैल 2013 में 5.5 बिलियन अमरीकी डॉलर रखी गई थी, जबकि जून 2013 में दीर्घकालिक निवेशकों के लिए इस सीमा को बढ़ाकर 5 बिलियन अमरीकी डॉलर कर दिया गया था। दीर्घकालिक प्रवाह प्रोत्साहित करने के लिए एक और कदम के रूप में सरकारी प्रतिभूतियों में एफपीआई द्वारा निवेश की अनुमति एक वर्ष या उससे अधिक की अवशिष्ट परिपक्वता वाली दिनांकित प्रतिभूतियों में भी दी जाएगी और खज़ाना बिलों में वर्तमान निवेश की अनुमति परिपक्वता/बिक्री पर कमी के लिए दी जाएगी। तथापि, सरकारी प्रतिभूतियों में एफपीआई निवेश की समग्र सीमा 30 बिलियन अमरीकी डॉलर पर अपरिवर्तित रहेगी, इसलिए लघु अवधि में रद्द की गई निवेश सीमाएं दीर्घावधि परिपक्वताओं में उपलब्ध रहेंगी। विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (एफडीआई) के संबंध में यह निर्णय लिया गया है कि शेयरों के अधिग्रहण/बिक्री के मामले में मूल्य निर्धारण से संबंधित वर्तमान सभी दिशानिर्देशों को वापस लिया जाए और तदनुसार ऐसे लेनदेन स्वीकार्य बाज़ार पद्धतियों पर आधारित होंगे। परिचालन दिशानिर्देश अलग से अधिसूचित किए जाएंगे।

निर्यात लेनदेन की प्रभावी निगरानी, आसान ट्रेकिंग तथा सामंजस्य के लिए निर्यात आंकड़ा संसाधन और निगरानी प्रणाली नामक एक व्यापक सूचना प्रौद्योगिकी आधारित प्रणाली फरवरी 1014 में शुरू की गई। इन आंकड़ों को इसमें शामिल स्टेकधारकों/एजेंसियों के बीच साझा किया जाएगा और निर्यात पर अधिक सामयिक और विस्तृत सूचना प्राप्त होगी तथा निर्यात संबंधित जालसाज़ी पर रोक लगेगी।

चौथे स्तंभ वित्तीय समावेशन पर पिरामिड के सबसे निचले स्तर पर लोगों के लिए ऋण के प्रवाह को तेज़ करने और नई संस्थाओं का बीसी के रूप में संभाव्य समावोशन सहित कारोबार संवाददाताओं (बीसी) के संपर्क क्षेत्र के विस्तार पर मोर समिति की सिफारिशों की जांच की जा रही है। कारोबारी संवाददाताओं के नकदी प्रबंध की चुनौती जो बीसी मॉडल के विस्तार में बाधा है, पर नियंत्रण पाने के लिए रिज़र्व बैंक बेहतर पद्धतियों को क्रमवार करेगा और वाणिज्यिक बैंकों को नई दिशानिर्देश जारी करेगा।

रिज़र्व बैंक ने व्यापार प्राप्य राशियों और सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) के लिए ऋण विनिमय पर मार्च 2014 में जनता की प्रतिसूचना हेतु अपनी वेबसाइट पर एक अवधारणा पत्र जारी किया है। पेपर में रेखांकित मॉडल में प्राथमिक और द्वितीय बाज़ार खंडों के साथ ऋण विनिमय की परिकल्पना की है जो एमएसएमई क्षेत्र द्वारा विलंबित भुगतान तथा अपने कंपनी क्रेताओं पर निर्भरता संबंधी समस्याओं के समाधान में सहायता करेगा। प्रतिसूचना प्राप्त करने के बाद रिज़र्व बैंक कार्यान्वयन के लिए कार्य करेगा।

उचित और पारदर्शी ऋण मूल्य निर्धारण सुनिश्चित करने तथा सूक्ष्म और लघु उद्यमों (एमएसई) उधारकर्ताओं के लिए ऋण प्रवाह को प्रोत्साहित करने की दृष्टि से अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों के लिए वांछनीय होगा कि वे एमएसई और अन्य उधारकर्ताओं जिनके ऋणों को ऋण गारंटी योजना के तहत शामिल किया गया है, उन्हें विभेदक ब्याज दर उपलब्ध कराएं। अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों को एमएसई क्षेत्र के लिए ऋण सुविधाओं के विस्तार को नियंत्रित करने वाली अपनी ऋण नीति की समीक्षा करने और एमएसई उधारकर्ता के लिए ऋण प्रस्तावों के अपने मूल्यांकन में बोर्ड द्वारा अनुमोदित साख गणना मॉडलों का उपयोग कर विचार करने के लिए प्रोत्साहित किया गया है।

तकनीकी के उचित अनुप्रयोग से समाज के वित्तीय रूप से असमावेशित खंडों तक बैंकिंग सेवाओं का विस्तार करने के लिए उपाय किए गए। गिरो परामर्शदात्री समूह (जीएजी) द्वारा केंद्रीकृत बिल भुगतान प्रणाली के लिए परतदार रूपरेखात्मक दृष्टिकोण की सिफारिश की गई है जिससे अंतर-परिचालनात्मकता अर्थात (क) भारत बिल भुगतान प्रणाली(बीबीपीएस) और (ख) भारत बिल भुगतान करनेवाली इकाइयों (बीबीपीओयूज़) संभव होगी। जीएजी रिपोर्ट के सिफारिशों का परीक्षण किया जा रहा है । वित्तीय समावेशन के लिए मोबाईल बैंकिंग को विकसित करने में बैंकों द्वारा जिन चुनौतियों का सामना किया जा रहा है उनका परीक्षण करने के लिए गठित तकनीकी समिति(अध्यक्ष : श्री बी.सांबमूर्ति) ने जनवरी 2014 में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की। इसे प्रतिसूचना के लिए वेबसाइट पर डाला गया है । समिति की सिफारिशों का बारीकी से परीक्षण किया जाएगा और आगामी योजना के संबंध में स्टेकधारकों के साथ चर्चा की जाएगी।

ग्राहक सुरक्षा वित्तीय समावेशन का अनिवार्य पहलू है। रिज़र्व बैंक का विचार है कि घरेलु अनुभव और अंतर्राष्ट्रीय सर्वोत्तम प्रणालियों के आधार पर विस्तृत ग्राहक सुरक्षा विनियमावली का निर्माण किया जाए। अपने ग्राहकों के हित में बैंकों को अपने उधारकर्ताओं को अस्थिर दर वाले मीयादी ऋणों के समयपूर्व-भुगतान की संभावनाओं के लिए बिना किसी दण्ड के अनुमति देनी चाहिए। बैंकों को ग्राहकों की समस्याओं अथवा असावधानी का अनुचित लाभ नहीं उठाना चाहिए। सामान्य बचत बैंक खातों में न्यूनतम शेषराशि न रखी जाने के मामले में दण्डात्मक प्रभार लगाने के बजाए बैंकों को सामान्य बचत बैंक जमा खातों को दी जाने वाली सेवाओं को सीमित करना चाहिए और न्यूनतम शेष राशि के स्तर में सुधार हो जाने पर सेवाओंको पुन: उपलब्ध कर दिया जाना चाहिए। बैंकों को परिचालन रहित किसी भी खाते में न्यूनतम शेष राशि न रखी जाने के मामले में कोई दण्डात्मक प्रभार नहीं लगाना चाहिए। इलैक्ट्रॉनिक बैंकिंग लेनदेन के मामले में जहां ग्राहकों की लापरवाही को सिद्ध कर पाना संभव नहीं हो वहां बैंक ग्राहकों की देयताओं को सीमित कर दिया जाए।

पांचवे स्तंभ के अंतर्गत कार्पोरेट और वित्तीय संस्थाओं की कठिनाइयों से निपटने में ऋण् वसुली के साथ-साथ वास्तविक और वित्तीय पुनर्संरचना को मजबूत करके बैंकिंग प्रणाली की क्षमताओं को वृद्धिंगत करने के संबंध में रिज़र्व बैंक ने जनवरी 2014 में अर्थव्यवस्था की समस्याग्रस्त आस्तियों को पुनर्जीवित करने के लिए एक रूपरेखा जारी की। रूपरेखा में वित्तीय समस्याओं की शीघ्र पहचान, उनके समाधान के लिए त्वरित उपाय और देनदारों के लिए उचित वसूली संबंधी दिशानिर्देश दिए गए हैं। हैं। इसमें केंद्रीकृत रिपोर्टिंग और बड़े ऋणों संबंधी सूचना का प्रसार , देनदारों के मंच का शीघ्र निर्माण और संकल्प पर सहमति के लिए देनदारों और उधारकर्ताओं को प्रोत्साहन और समय पर कार्रवाई करने में असफलता के लिए दोनों को हतोत्साहित करने से संबंधित बताया गया है। चालू पुनर्संगठन प्रणाली में सुधार जैसेकि अर्थक्षमता को ध्यान में रखते हुए बड़े मूल्य के पुनर्संगठन का स्वतंत्र मूल्यांकन और प्रायोजकों और देनदारों के बीच लाभ तथा हानियों में उचित सहभागिता अनिवार्य है । अंतत:, समस्याग्रस्त आस्तियों की बिक्री,विशेषत: आस्ति पुनर्संगठन कंपनियों के लिए कुछ अधिक उदार विनियामक उपाय उपलब्ध कराए गए हैं। यह रूपरेखा आज से पूरीतरह से लागू हो जाएगी।

30 अक्तूबर 2013 की दूसरी तिमाही की समीक्षा की घोषणा के बाद वित्तीय संस्थाओं के विश्लेषण पद्धति (समाधान व्यवस्था) पर गठित कार्यदल (अध्यक्ष : डॉ.अरविंद मायाराम और आनंद सिन्हा)ने जनवरी2013 में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की। कार्यदल द्वारा अन्य बातों के साथ-साथ एकल वित्तीय संकल्प प्राधिकरण (एफआरए),सभी वित्तीय संस्थाओं के लिए तुरंत सुधारात्मक कार्रवाई (पीसीए) की रूपरेखा के रूप में एक प्रारंभिक पर्यवेक्षी हस्तक्षेपकार्य प्रणाली के और स्वामित्व पर ध्यान दिए बिना सभी वित्तीय संस्थाओं के उचित विश्लेषण के लिए शक्तियां और साधनों की आपूर्ति करनेवाले एक स्वतंत्र व्यापक विधिक ढ़ांचे के निर्माण की सिफारिश की गई । दल की रिपोर्ट टिप्पणियों हेतु प्रसारित की जाएगी।

गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (एनबीएफसीज़) के लिए प्रचलित विनियामक ढ़ांचे की कई महत्वपूर्ण गतिविधियों के अनुरूप बनाया जा रहा है ताकि वित्तीय क्षेत्र में हो रही कई महत्वपूर्ण गतिविधियों के साथ उसे जोड़ा जा सके। इसलिए यह प्रस्ताव है कि कुछ अपवादों को छोड़कर एनबीएफसीज़ का कारोबार करने के लिए पंजीकरण प्रमाणपत्र(सीओआर) जारी करने का मामला, जन हित को छोड़कर एनबीएफसी क्षेत्र के लिए उचित विनियामक ढ़ांचे के निर्माण तक आस्थगित रखा जाए। विस्तृत जानकारी अलग से जारी की जा रही है ।

आगे जाकर, पॉंच स्तम्भों वाला यह दृष्टिकोण विकासात्मक उपायों की रूपरेखा तैयार करने एवं समायोजन के लिए मार्गदर्शक बना रहेगा। बैंकिंग क्षेत्र में बढ़ती प्रतिस्पर्धात्मकता के साथ वित्तीय बाज़ार, बैंकों को अपनी दीर्घ कालिक आस्तियों के कारोबार और आस्तियों और देयताओं की मीयादी रूपरेखा को समान रूप देने की अनुमति देते हुए संपूरक की भूमिका निभानी होगी। साथ-ही-साथ रिज़र्व बैंक दूरस्थ अथवा आम व्यक्ति प्रत्येक के लिए प्रौद्योगिकी, नए उत्पादों का प्रयोग करते हुए वित्तीय सेवाओं की आपूर्ति करने और नई संस्थाओं के माध्यम से लोगों को औपचारिक वित्तीय प्रणाली के साथ जोड़ने के लिए प्रयासरत रहेगा।

अल्पना किल्लावाला
प्रधान मुख्य महाप्रबंधक

प्रेस प्रकाशनी : 2013-2014/1925

 
 
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