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माल और सेवाओं के आयात के संबंध में मास्टर परिपत्र

भारिबैंक/2014-15/4
मास्टर परिपत्र सं.13/2014-15

1 जुलाई 2014
(30 अप्रैल 2015 तक अद्यतन)

सभी श्रेणी-I प्राधिकृत व्यापारी बैंक

महोदया /महोदय,

माल और सेवाओं के आयात के संबंध में मास्टर परिपत्र

भारत में माल और सेवाओं के आयात की अनुमति, समय-समय पर यथा संशोधित, 3 मई 2000 की अधिसूचना सं. जी.एस.आर. 381(ई) अर्थात विदेशी मुद्रा प्रबंध (चालू खाता) नियमावली, 2000 के साथ पठित विदेशी मुद्रा प्रबंध अधिनियम, 1999 (1999 का 42) की धारा 5 के अनुसार दी जा रही है।

2. इस मास्टर परिपत्र में ' माल और सेवाओं के आयात' विषय पर वर्तमान अनुदेशों को एक स्थान पर समेकित किया गया है । इस मास्टर परिपत्र में समेकित परिपत्रों की सूची परिशिष्ट में दी गयी है।

3. नए अनुदेश जारी होने पर, इस मास्टर परिपत्र को समय-समय पर अद्यतन किया जाता है। मास्टर परिपत्र किस तारीख तक अद्यतन है, इसका उचित रूप में उल्लेख किया जाता है।

4. सामान्य मार्गदर्शन के लिए इस मास्टर परिपत्र का संदर्भ लिया जाए। आवश्यक होने पर विस्तृत जानकारी के लिए प्राधिकृत व्यक्ति और प्राधिकृत व्यापारी श्रेणी-I बैंक संबंधित परिपत्रों/अधिसूचनाओं का संदर्भ लें।

भवदीय,

(सी.डी.श्रीनिवासन)
मुख्य महाप्रबंधक


विषय सूची

खण्ड I - प्रस्तावना
खण्ड II - आयात के लिए सामान्य दिशा-निर्देश
बी.1. सामान्य दिशा-निर्देश
बी.2. फार्म ए-1
बी.3. आयात लाइसेंस
बी.4.विदेशी मुद्रा के क्रेता का दायित्व
बी.5.आयात भुगतान के निपटान की समय सीमा
बी.6.विदेशी मुद्रा/ भारतीय रुपए का आयात
बी.7. आयात लेन-देनों का तीसरे पक्ष को भुगतान
खंड-III आयात के लिए परिचालनगत दिशा-निर्देश
सी-1. अग्रिम विप्रेषण
सी.2. आयात बिलों पर ब्याज
सी.3. प्रतिस्थापन आयात के लिए विप्रेषण
सी.4. प्रतिस्थापन आयात के लिए गारंटी
सी.5. बिज़नेस प्रोसैस आउटसोर्सिंग (बीपीओ) कंपनियों द्वारा उनकी समुद्रपारीय साइटों के लिए उपकरणों का आयात
सी.6. समुद्रपारीय आपूर्तिकर्ताओं से आयातक को सीधे आयात बिलों/दस्तावेजों की प्राप्ति
सी.7. आयात का साक्ष्य
सी.8. प्राप्ति सूचना जारी करना
सी.9. सत्यापन और परिरक्षण
सी.10. आयात साक्ष्यों का अनुवर्तन
सी.11. बैंक गारंटी जारी करना
सी.12. सोने का आयात
सी.13. अन्य कीमती धातुओं का आयात
सी.14. आयात फैक्टरिंग
सी.15. वाणिज्यिक (मर्चेटिंग) व्यापार
संलग्न - 1
संलग्न - 2
संलग्न – 3
परिशिष्ट
मास्टर परिपत्र में समेकित परिपत्रों की सूची

खण्ड I-प्रस्तावना

(i) आयात व्यापार का विनियमन भारत सरकार के वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय, वाणिज्य विभाग के अंतर्गत विदेश व्यापार महानिदेशालय द्वारा किया जाता है। प्राधिकृत व्यापारी श्रेणी I बैंक यह सुनिश्चित करें कि भारत में आयात प्रचलित आयात-निर्यात नीति और भारत सरकार द्वारा 3 मई 2000 की अधिसूचना सं.जी.एस.आर. 381(E) द्वारा निर्मित विदेशी मुद्रा प्रबंध (चालू खाता लेनदेन) नियमावली, 2000 और विदेशी मुद्रा प्रबंध अधिनियम के अधीन भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा, समय- समय पर, जारी निदेशों के अनुरूप हैं।

(ii) भारत में आयात के लिए अपने ग्राहकों की ओर से साखपत्र खोलते समय प्राधिकृत व्यापारी श्रेणी I बैंक, सामान्य बैंकिंग कार्य प्रणालियों का अनुसरण करें और प्रलेखी क्रेडिट के लिए एक समान प्रथा और व्यवहार (यूसीपीडीसी) आदि के प्रावधानों का पालन करें ।

(iii) ड्रॉइंग और डिज़ाइन के आयात के संबंध में अनुसंधान एवं विकास प्रशुल्क अधिनियम (रिसर्च एण्ड डेवलपमेंट सेस एक्ट), 1986 के प्रावधानों का अनुपालन सुनिश्चित किया जाए।

(iv) प्राधिकृत व्यापारी श्रेणी- I बैंक आयातकों को यह भी सूचित करें कि वे यथा लागू आयकर अधिनियम के प्रावधानों का अनुपालन सुनिश्चित करें।

(V) यदि किसी विषय पर रिज़र्व बैंक को कोई संदर्भ भेजना हो, तो जब तक अलग से इंगित न किया गया हो तब तक आवेदक जहां रहता हो अथवा फर्म/कंपनी जहां कार्यरत हो, उस क्षेत्र में स्थित विदेशी मुद्रा विभाग के क्षेत्रीय कार्यालय से पहले संपर्क किया जाए। यदि किसी विशेष कारण से उन्हें किसी अन्य कार्यालय के साथ पत्र व्यवहार करना हो तो वे अपने क्षेत्र में स्थित रिज़र्व बैंक के संबन्धित क्षेत्रीय कार्यालय से इसके लिए संपर्क करें।

खण्ड II - आयात के लिए सामान्य दिशा-निर्देश

बी.1.सामान्य दिशा-निर्देश

अपने ग्राहकों की ओर से आयात भुगतान लेनदेन करते समय प्राधिकृत व्यापारी श्रेणी I बैंकों द्वारा विदेशी मुद्रा नियंत्रण की दृष्टि से अनुसरण की जानेवाली नियमावली और विनियमावली, निम्नलिखित पैराग्राफों में निर्धारित की गई है। जहां पर विनिर्दिष्ट विनियमावली मौजूद नहीं है, वहां प्राधिकृत व्यापारी श्रेणी I बैंक सामान्य व्यापार परिपाटी (प्रथा) द्वारा नियंत्रित होंगे। प्राधिकृत व्यापारी श्रेणी- I बैंक अपने सभी लेनदेनों में भारतीय रिज़र्व बैंक (बैंकिंग परिचालन और विकास विभाग) द्वारा जारी "अपने ग्राहक को जानने" (केवाईसी) संबंधी दिशा-निर्देशों का पालन करने पर विशेष रूप से ध्यान दें।

बी. 2.फॉर्म ए-1

अब से प्राधिकृत व्यापारी बैंकों को फार्म ए-I का प्रस्तुतीकरण आवश्यक नहीं होगा और भारत में आयात के लिए किए जाने वाले भुगतान हेतु विप्रेषण करने से पूर्व प्राधिकृत व्यापारी बैंक यह सुनिश्चित करें कि आयातक द्वारा सभी अपेक्षित ब्योरे उपलब्ध कराए जाएं एवं यथा लागू विधियों के अुनसार सद्भावी(bonafide) व्यापारिक लेनदेनों के लिए ही विप्रेषण किए जाएं।

बी.3. आयात लाइसेंस

नकारात्मक सूची में शामिल माल, जिनके लिए प्रचलित विदेश व्यापार नीति के अंतर्गत लाइसेंस प्राप्त करना अपेक्षित है, उनको छोड़कर, प्राधिकृत व्यापारी श्रेणी- I बैंक, आयात के लिए साखपत्र मुक्त रूप से खोलें और विप्रेषणों की अनुमति दें। साखपत्र खोलते समय लाइसेंस की "विदेशी मुद्रा नियंत्रण के प्रयोजन हेतु" प्रति मंगायी जाए और लाइसेंस के साथ संलग्न विशेष शर्तें, यदि कोई हों, का पालन किया जाए। लाइसेंस के तहत विप्रेषण करने के बाद प्रयुक्त लाइसेंस की प्रतिलिपि, प्राधिकृत व्यापारी श्रेणी- I बैंक आंतरिक लेखा परीक्षकों अथवा निरीक्षकों द्वारा सत्यापन किए जाने तक अपने पास सुरक्षित रखें।

बी.4.विदेशी मुद्रा के क्रेता का दायित्व

(i) विदेशी मुद्रा प्रबंध अधिनियम, 1999 (फेमा) की धारा 10(6) के अनुसार, विदेशी मुद्रा का अधिग्रहण करने वाले किसी भी व्यक्ति को अनुमति है कि वह ली गई विदेशी मुद्रा को अधिनियम की धारा 10(5) के तहत प्राधिकृत व्यापारी श्रेणी- I बैंक को दी गई अपनी घोषणा में उल्लिखित प्रयोजन के लिए अथवा उक्त अधिनियम अथवा उसके अधीन बनाई गई नियमावली अथवा विनियमावली के अंतर्गत किसी अन्य प्रयोजन हेतु, जिसके लिए विदेशी मुद्रा का अभिग्रहण स्वीकार्य/ अनुमत है, उपयोग कर सकता है।

(ii) जहां अर्जित की गई विदेशी मुद्रा का उपयोग भारत में माल के आयात के लिए कर लिया गया है, वहां प्राधिकृत व्यापारी श्रेणी-I बैंक यह सुनिश्चित करें कि आयातक आयात के साक्ष्य अर्थात बिल ऑफ एंट्री की एक्सचेंज कंट्रोल कॉपी, पोस्टल अप्रेज़ल (appraisal) फार्म अथवा सीमा शुल्क विभाग का मूल्यांकन प्रमाणपत्र, आदि प्रस्तुत करे तथा इस बात से खुद को भी संतुष्ट कर ले कि विप्रेषण के मूल्य के समतुल्य माल का आयात किया गया है ।

(iii) 3 मई 2000 की अधिसूचना सं. फेमा14/2000-आरबी में निर्धारित आयात के भुगतान की अनुमत विधियों के अतिरिक्त, आयात का भुगतान भारत में किसी बैंक के पास रखे गये समुद्रपारीय निर्यातक के अनिवासी खाते में जमा द्वारा भी किया जा सकता है। ऐसे मामलों में भी प्राधिकृत व्यापारी श्रेणी- I बैंक, उक्त उप-पैराग्राफों (i) और (ii) में दिए गए निर्देशों का अनुपालन सुनिश्चित करें ।

बी.5आयात के भुगतान के निपटान के लिए समय-सीमा

बी.5.1 सामान्य आयात के लिए समय - सीमा

(i) मौज़ूदा विनियमों के अनुसार, गारंटी निष्पादन आदि कारणों से रोकी गई राशि के मामलों को छोड़कर आयात के लिए विप्रेषणों को पोत-लदान की तारीख से अधिकतम छह महीने तक पूरा कर लिया जाना चाहिए।

(ii) प्राधिकृत व्यापारी श्रेणी-I बैंक, विवादों, वित्तीय कठिनाइयों आदि के कारण विलंबित आयात देयताओं के भुगतान के लिए अनुमति दे सकते हैं। ऐसे विलंबित भुगतानों के ब्याज, मीयादी बिल अथवा पोत लदान की तारीख से तीन वर्षों से कम अवधि के लिए अतिदेय ब्याज की अनुमति निम्नलिखित भाग III के पैरा सी.2 के निदेशों के अनुसार दी जाए ।

बी.5.2 आस्थगित भुगतान व्यवस्था की समय-सीमा

पोतलदान की तारीख से छः महीने की अवधि से आगे तीन वर्ष की अवधि से कम की अवधि के भुगतानों का प्रावधान करनेवाले आपूर्तिकर्ता और क्रेता ऋण सहित आस्थगित भुगतान की व्यवस्था को व्यापार ऋण के रूप में समझा जाता है जिसके लिए बाह्य वाणिज्यिक उधार और व्यापार ऋण के मास्टर परिपत्र में निर्धारित प्रक्रियागत दिशा-निर्देशों का पालन किया जाए।

बी.5.3 पुस्तकों के आयात के लिए समय-सीमा

पुस्तकों के आयात के विप्रेषण को किसी समय सीमा के बिना अनुमति दी जाए बशर्ते कि ब्याज का भुगतान, यदि कोई हो, इस परिपत्र के भाग III के पैराग्राफ सी. 2 में निहित अनुदेशों के अनुसार हो।

बी.6. विदेशी मुद्रा/ भारतीय रुपए का आयात

(i) विनियमावली में दिए गए अपवादों को छोड़कर, कोई व्यक्ति रिज़र्व बैंक की सामान्य अथवा विशेष अनुमति के बगैर किसी विदेशी मुद्रा का भारत में आयात नहीं करेगा अथवा भारत में नहीं लाएगा। चेक सहित करेंसी के आयात को विदेशी मुद्रा प्रबंध अधिनियम 1999 की धारा 6 की उप-धारा (3) के खंड (जी) और समय-समय पर यथासंशोधित 3 मई 2000 की अधिसूचना सं. फेमा 6/2000-आरबी के अनुसार रिज़र्व बैंक द्वारा बनाई गई विदेशी मुद्रा प्रबंध (करेंसी का निर्यात और आयात) नियमावली, 2000 द्वारा नियंत्रित किया जाता है।

(ii) रिज़र्व बैंक अपनी निर्धारित शर्तों के अधीन किसी व्यक्ति को भारत सरकार और/ अथवा रिज़र्व बैंक के करेंसी नोट भारत में लाने की अनुमति दे सकता है।

बी.6.1. भारत में विदेशी मुद्रा का आयात

कोई व्यक्ति -

(i) करेंसी नोटों, बैंक नोटों और यात्री चेकों को छोड़कर किसी भी रूप में बिना किसी सीमा के भारत को विदेशी मुद्रा भेज सकता है;

(ii) भारत से बाहर के किसी भी स्थान से किसी भी सीमा तक की विदेशी मुद्रा (जारी न किए गए नोटों को छोड़कर) भारत ला सकता है, जो इस शर्त के अधीन होगा कि वह व्यक्ति भारत आने पर इन विनियमों के संलग्नक में दिये गये करेंसी घोषणा फार्म (सीडीएफ) में कस्टम अधिकारियों को घोषणापत्र प्रस्तुत करे; तथापि, इसके अतिरिक्त वहां ऐसी घोषणा करना आवश्यक नहीं होगा जहां किसी भी समय किसी व्यक्ति द्वारा करेंसी नोट, बैंक नोट अथवा यात्री चेक के रूप में लायी गयी विदेशी मुद्रा का सकल मूल्य 10,000 अमरीकी डॉलर (दस हजार अमरीकी डॉलर) अथवा इसके समतुल्य से अधिक न हो और/अथवा किसी भी समय ऐसे व्यक्ति द्वारा लायी गई नकद विदेशी मुद्रा (नकद हिस्सा) का सकल मूल्य 5,000 अमरीकी डॉलर (पांच हज़ार अमरीकी डॉलर) अथवा इसके समतुल्य से अधिक न हो।

बी.6.2. भारतीय करेंसी और करेंसी नोटों का आयात

(i) अस्थायी दौरे पर भारत से बाहर गया भारत का निवासी कोई व्यक्ति भारत से बाहर के किसी स्थान (नेपाल और भूटान को छोड़कर) से भारत लौटते समय प्रति व्यक्ति अधिकतम रु. 25,000 (25000 हजार रुपए मात्र) की राशि तक के भारत सरकार के करेंसी नोट और रिज़र्व बैंक के नोट भारत ला सकता है।

(ii) कोई व्यक्ति नेपाल अथवा भूटान से 100 रुपए मूल्यवर्ग तक के भारत सरकार के करेंसी नोट और रिज़र्व बैंक के नोट भारत ला सकता है।

बी.7. आयात लेनदेन हेतु तृतीय पक्षीय भुगतान:

प्राधिकृत व्यापारी बैंकों को निम्नलिखित शर्तों के अधीन माल के आयात हेतु तृतीय पक्ष को भुगतान करने की अनुमति दी गई है:

ए) अप्रतिसंहरणीय क्रय आदेश / त्रिपक्षीय करार की प्रति उपलब्ध हो । उन मामलों में यह अपेक्षा लागू नहीं होगी जहां तृतीय पक्ष को भुगतान करने हेतु उत्पन्न हुई परिस्थितियों का दस्तावेजी प्रमाण दिया गया हो / तृतीय पक्ष के नाम के उल्लेख वाला अप्रतिसंहरणीय आदेश/ इन्वाइस प्रस्तुत किया गया हो;

बी) प्राधिकृत व्यापारी बैंक इन लेनदेनों की वास्तविकता के बारे में स्वयं संतुष्ट हों और इस प्रकार के लेनदेनों के निपटान/भुगतान करने से पूर्व ऐसे मामलों में वित्तीय कार्रवाई कार्य-दल (FATF) स्टेटमेंट का ध्यान रखें;

सी) इन्वाइस में इस बात का उल्लेख हो कि संबन्धित भुगतान (नामित) तृतीय पक्ष को किया जाना है ;

डी) प्रवेश बिल (bill fo entry) में माल वाहक के नाम का उल्लेख हो और उसमें यह भी उल्लेख हो कि संबन्धित भुगतान (नामित) तृतीय पक्ष को किया जाना है ;

ई) आयातक आयात संबंधी वर्तमान दिशा-निर्देशों सहित उन निर्देशों का भी अनुपालन करें जिसमें माल के आयात पर अग्रिम भुगतान किया जाना हो ।

खण्ड III -आयात के लिए परिचालनगत दिशा-निर्देश

सी.1 अग्रिम विप्रेषण

सी.1.1. माल के आयात के लिए अग्रिम विप्रेषण

(i) प्राधिकृत व्यापारी श्रेणी -I बैंक, माल के आयात के लिए निम्नलिखित शर्तों के अधीन बिना किसी सीमा के अग्रिम विप्रेषण की अनुमति दे सकते हैं:

(ए) यदि अग्रिम विप्रेषण की राशि 200,000 अमरीकी डॉलर अथवा उसके समतुल्य राशि से अधिक हो तो भारत से बाहर के अंतर्राष्ट्रीय प्रतिष्ठित बैंक से बिना किसी शर्त अप्रतिसंहरणीय अतिरिक्त साखपत्र अथवा भारत में किसी प्राधिकृत व्यापारी श्रेणी- I बैंक की गारंटी, यदि ऐसी गारंटी भारत से बाहर के किसी अंतर्राष्ट्रीय प्रतिष्ठित बैंक द्वारा काउंटर-गारंटी पर जारी की गयी हो, प्राप्त किये जाएं ।

(बी) जहाँ आयातक (सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी या भारत सरकार / राज्य सरकार(रों) के विभाग / उपक्रम को छोड़कर) विदेशी (समुद्रपारीय) आपूर्तिकर्ता से बैंक गारंटी प्राप्त करने में असमर्थ है और प्राधिकृत व्यापारी श्रेणी I बैंक, आयातक के पिछले आयात वसूली के ट्रैक रिकॉर्ड तथा प्रामाणिकता से संतुष्ट है, 5,000,000 अमरीकी डॉलर (पांच मिलियन अमरीकी डॉलर) तक के अग्रिम विप्रेषण के लिए बैंक गारंटी/अतिरिक्त साख पत्र प्रस्तुत करने के लिए दबाव न डाले । प्राधिकृत व्यापारी श्रेणी-I बैंक, बैंक अपने निदेशक मंडल द्वारा बनायी गयी उपयुक्त नीति के तहत ऐसे मामलों के निपटान के लिए स्वयं आंतरिक दिशा-निर्देश करें।

(सी) जहाँ आयातक सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी या भारत सरकार / राज्य सरकार (रों) के विभाग / उपक्रम हों जो अंतर-राष्ट्रीय प्रतिष्ठित बैंक से अग्रिम भुगतान के बाबत बैंक गारंटी प्राप्त करने की स्थिति में नहीं है/हैं, वहाँ 100,000 अमरीकी डॉलर से अधिक के अग्रिम विप्रेषण के लिए, विप्रेषण भेजने से पहले, उससे/उनसे अपेक्षित है कि वह/वे वित्त मंत्रालय, भारत सरकार से विशेष छूट की अनुमति प्राप्त करे/करें ।

(ii) आयात के लिए अग्रिम विप्रेषण के संबंध में सभी भुगतान विनिर्दिष्ट शर्तों के अधीन होंगे ।

सी.1.2 कच्चे हीरों के आयात के लिए अग्रिम विप्रेषण

प्राधिकृत व्यापारी श्रेणी- I बैंकों को उन समुद्रपारीय खनन कंपनियों के संबंध में निर्णय लेने की अनुमति है जिन्हें आयातक (सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी अथवा भारत सरकार/राज्य सरकारों के विभाग/उपक्रमों को छोड़कर) गारंटी अथवा समर्थनकारी साखपत्र के बिना अग्रिम भुगतान कर सकते हैं। इस संबंध में बैंकों द्वारा निम्नलिखित बातों को सुनिश्चित किया जाए:

  1. रत्न और जवाहरात निर्यात संवर्धन परिषद (GJEPC) द्वारा समुद्रपारीय खनन कंपनी की संस्तुति की गई हो।

  2. आयातक कच्चे हीरों का मान्यता प्राप्त संसाधक (प्रोसेसर) हो और उसका अच्छा ट्रैक रेकार्ड हो।

  3. प्राधिकृत व्यापारी श्रेणी I बैंक अपने वाणिज्यिक निर्णय के आधार पर और लेनदेन की वास्तविकता (bonafides) से संतुष्ट होने पर ही लेनदेन करें।

  4. अग्रिम का भुगतान बिक्रीगत संविदा शर्तों के आधार पर ही किया जाना चाहिए और उसे संबंधित कंपनी अर्थात अंतिम लाभार्थी के खाते में ही क्रेडिट किया जाना चाहिए, न कि दिए गए अन्य खाता नंबर अथवा अन्यथा के जरिए।

  5. इसके अलावा, यह सुनिश्चित करने के लिए सावधानी बरती जाए कि कनफ्लिक्ट हीरों (किम्बरली प्रमाणित हीरों) के आयात के लिए विप्रेषण की अनुमति न दी जाए।

  6. मौजूदा दिशानिर्देशों के अनुसार प्राधिकृत व्यापारी श्रेणी I बैंकों द्वारा अपने ग्राहक को जानने (केवासी) एवं समुचित सावधानी (due diligence) बरतने की प्रक्रिया का पालन किया जाए।

  7. प्राधिकृत व्यापारी श्रेणी-I बैंकों को इस संबंध में जारी अधिनियम/नियमावलियों/ विनियमावलियों/निर्देशों के अनुसार आयातक द्वारा देश में कच्चे हीरों के आयात के साक्ष्य के रूप में बिल ऑफ एंट्री/दस्तावेजों की प्रस्तुति हेतु अनुवर्ती कार्रवाई करनी चाहिए।

  8. यदि आयातक एंटिटी सार्वजनिक क्षेत्र से हो अथवा भारत सरकार/राज्य सरकार का कोई विभाग/उपक्रम हो, तो जहां अग्रिम के रूप में भुगतान राशि 1,00,000 अमरीकी डालर (एक सौ हजार अमरीकी डालर मात्र) के समतुल्य अथवा अधिक हो, प्राधिकृत व्यापारी श्रेणी I बैंक अग्रिम विप्रेषण की अनुमति उल्लिखित शर्तों के पूरी होने और वित्त मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा बैंक गारंटी देने से दी गई छूट पर अग्रिम विप्रेषण की अनुमति दे सकता है।

सी.1.3. वायुयान/हेलीकॉप्टर और अन्य विमानन संबंधी खरीद गत आयात हेतु अग्रिम विप्रेषण

एक क्षेत्र विशेष के उपाय के रूप में अनुसूचित हवाई यातायात सेवा के रूप में कार्य करने के लिए नागर विमानन महानिदेशालय से अनुमति प्राप्त एयरलाइन कंपनियों को बैंक गारंटी के बिना, 50 मिलियन अमरीकी डॉलर तक के अग्रिम विप्रेषण की अनुमति दी गई है। तदनुसार, प्राधिकृत व्यापारी श्रेणी- I बैंक प्रत्येक वायुयान, हेलीकॉप्टर और विमानन संबंधी अन्य खरीदों के सीधे आयात के लिए शर्तरहित, अविकल्पी समर्थनकारी साखपत्र के बिना 50 मिलियन अमरीकी डालर तक के अग्रिम विप्रेषण की अनुमति दे सकते हैं। उपर्युक्त लेनदेनों के लिए विप्रेषण निम्नलिखित शर्तों के अधीन होंगे।

  1. प्राधिकृत व्यापारी श्रेणी I बैंक, लेनदेन की वास्तविकता के बारे में स्वयं संतुष्ट होने और अपने वाणिज्यिक निर्णय के आधार पर लेनदेन करें। प्राधिकृत व्यापारी श्रेणी- I बैंक भारतीय आयातक कंपनी तथा समुद्रपारीय विनिर्माता कंपनी के संबंध में " अपने ग्राहक को जाने " संबंधी मानदंडों और समुचित सावधानी के उपायों का पालन करें।

  2. अग्रिम भुगतान बिक्री करार की शर्तों के अनुसार ही किया जाए और संबंधित विनिर्माता (आपूर्तिकर्ता ) के खाते में सीधे जमा किया जाए।

  3. प्राधिकृत व्यापारी श्रेणी- I बैंक ऐसे मामलों पर कार्रवाई करने के लिए अपने निदेशक मंडल के अनुमोदन से अपने आंतरिक दिशा-निर्देश तैयार करें।

  4. सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी अथवा केन्द्र सरकार/ राज्य सरकार के विभाग/उपक्रम के मामले में प्राधिकृत व्यापारी श्रेणी- I बैंक, यह सुनिश्चित करें कि 100,000 अमरीकी डॉलर से अधिक के अग्रिम विप्रेषण के लिए वित्त मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा बैंक गारंटी की अपेक्षा से विशेष छूट मिली हुई है।

  5. भारत में माल का वास्तविक आयात विप्रेषण की तारीख से छः माह (पूंजीगत माल के लिए तीन वर्ष) के अंदर किया जाता है और आयातक, संबंधित अवधि की समाप्ति से पंद्रह दिनों के अंदर आयात के दस्तावेजी साक्ष्य प्रस्तुत करने का वचनपत्र देता है। यह स्पष्ट किया जाता है कि जहां अग्रिम का भुगतान चरणबद्ध रूप में किया जाता है, वहां करार के अनुसार किए गए अंतिम विप्रेषण की तारीख को आयात के दस्तावेजी साक्ष्य की प्रस्तुति के लिए गिना जाएगा।

  6. विप्रेषण करने से पहले, प्राधिकृत व्यापारी श्रेणी- I बैंक यह सुनिश्चित करें कि आयात के लिए कंपनी ने वर्तमान विदेश व्यापार नीति के अनुसार नागर विमानन मंत्रालय/ नागर विमानन महानिदेशालय/ अन्य एजेंसियों से आवश्यक अनुमोदन प्राप्त किया है।

  7. वायुयान और विमानन क्षेत्र संबंधी उत्पादों के आयातित न होने की स्थिति में प्राधिकृत व्यापारी श्रेणी -I बैंक यह सुनिश्चित करें कि अग्रिम विप्रेषण की राशि भारत को तत्काल प्रत्यावर्तित की जाती है।

उपर्युक्त शर्तों से किसी प्रकार का बदलाव (विचलन) होने की स्थिति में रिज़र्व बैंक के संबंधित क्षेत्रीय कार्यालय का पूर्वानुमोदन आवश्यक होगा।

सी.1.4. सेवाओं के आयात के लिए अग्रिम विप्रेषण

प्राधिकृत व्यापारी श्रेणी - I बैंक सेवाओं के आयात के लिए निम्नलिखित शर्तों पर किसी सीमा के बगैर अग्रिम विप्रेषण के लिए अनुमति दें :

(ए) यदि अग्रिम की राशि 500,000 अमरीकी डॉलर अथवा उसकी समतुल्य राशि से अधिक होती है तो समुद्रपारीय लाभार्थी से भारत के बाहर स्थित अंतर्राष्ट्रीय प्रतिष्ठित बैंक से गारंटी अथवा भारत में प्राधिकृत व्यापारी श्रेणी - I बैंक से गारंटी, यदि इस प्रकार की गारंटी भारत के बाहर स्थित अंतर्राष्ट्रीय प्रतिष्ठित बैंक की काउंटर-गारंटी के लिए जारी की जाती है, प्राप्त करनी चाहिए ।

(बी) सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी अथवा भारत सरकार/राज्य सरकारों के विभाग/उपक्रम को 100,000 (एक लाख अमरीकी डॉलर) अमरीकी डॉलर से अधिक अथवा उसकी समतुल्य राशि, बैंक की गारंटी के बिना, सेवाओं के आयात हेतु अग्रिम विप्रेषण करने के लिए वित्त मंत्रालय, भारत सरकार से अनुमोदन प्राप्त करना आवश्यक होगा ।

(सी) प्राधिकृत व्यापारी श्रेणी - I बैंक यह सुनिश्चित करने के लिए भी अनुवर्ती कार्रवाई करें कि अग्रिम विप्रेषण का लाभार्थी भारत में विप्रेषणकर्ता के साथ संविदा अथवा करार के तहत अपने प्रति दायित्व पूर्ण करता है, ऐसा न करने पर उक्त राशि भारत को प्रत्यावर्तित की जानी चाहिए ।

सी.2. आयात बिलों पर ब्याज

(i) प्राधिकृत व्यापारी श्रेणी-I बैंक, लदान की तारीख से तीन वर्ष से कम अवधि के लिए समय-समय पर व्यापार ऋण के लिए निर्धारित दरों पर मीयादी बिल पर ब्याज अथवा अतिदेय ब्याज के भुगतान की अनुमति दे सकते हैं।

(ii) मीयादी आयात बिलों के पूर्व भुगतान के मामले में, दावा की गई दर पर असमाप्त मीयाद के लिए आनुपातिक ब्याज घटाने के बाद ही अथवा करेंसी के लिबोर, जिस पर माल का बीजक बनाया गया है, जो भी लागू हो, विप्रेषण किया जाए। जहां ब्याज के लिए अलग से दावा नहीं किया गया है अथवा स्पष्ट रूप से न दर्शाया गया हो, इन्वाइस की करेंसी के प्रचलित लिबोर पर असमाप्त मीयाद के लिए आनुपातिक ब्याज की कटौती के बाद विप्रेषण की अनुमति दी जाए।

सी.3. प्रतिस्थापन आयात के बदले विप्रेषण

यदि माल की कम आपूर्ति हुई है, माल क्षतिग्रस्त हो गया है, कम मात्रा में पहुंचा है अथवा रास्ते में खो गया है और मूल माल, जो खो गया है, की जमानत पर खोले गए साख पत्र की सुरक्षा के लिए आयात लाइसेंस की विदेशी मुद्रा नियंत्रण प्रतिलिपि का उपयोग किया जा चुका है, तो प्राधिकृत व्यापारी श्रेणी- I बैंक, खोए हुए माल की कीमत तक के मूल पृष्ठांकन को रद्द करें और रिज़र्व बैंक को लिखे बिना आयात के प्रतिस्थापन के लिए नए विप्रेषण की अनुमति दें, बशर्ते खोए हुए माल से संबंधित बीमा दावा आयातक के पक्ष में निपटाया गया हो। यह सुनिश्चित किया जाए कि प्रतिस्थापित कन्साइनमेंट लाइसेंस की वैधता अवधि के भीतर ही भेज दिया जाता है।

सी.4. प्रतिस्थापन आयात के लिए गारंटी

दोषपूर्ण आयात के प्रतिस्थापन के मामलों में, यदि समुद्रपारीय आपूर्तिकर्ता द्वारा पूर्व में आयातित दोषपूर्ण माल को पुनः भारत से बाहर भेजे जाने से पहले आयात किया जा रहा है तो दोषपूर्ण माल के भेजने/ वापसी के लिए आयातक ग्राहक के अनुरोध पर प्राधिकृत व्यापारी श्रेणी I बैंक, अपने वाणिज्यिक निर्णय के अनुसार गारंटी जारी कर सकते हैं।

सी.5 कारोबारी प्रक्रिया आऊटसोर्सिंग (बीपीओ) कंपनियों द्वारा अपने समुद्रापारीय कार्यालयों के लिए उपकरणों का आयात

प्राधिकृत व्यापारी श्रेणी I बैंक, भारत स्थित बीपीओ कंपनियों को उनके समुद्रपारीय अंतर्राष्ट्रीय कॉल सेंटरों (आईसीसी) की स्थापना के संबध में उनके समुद्रपारीय कार्यालयों के लिए उपकरणों के आयात और उन्हें संस्थापित करने की लागत हेतु निम्नलिखित शर्तों के अधीन विप्रेषण की अनुमति दे सकते हैं :

(i) कारोबारी प्रक्रिया आउटसोर्सिंग कंपनी (बीपीओ कंपनी) द्वारा अंतरराष्ट्रीय कॉल सेंटर की स्थापना के लिए संचार और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय, भारत सरकार तथा संबंधित अन्य प्राधिकरणों से आवश्यक अनुमोदन प्राप्त किया जाना चाहिए।

(ii) प्राधिकृत व्यापारी श्रेणी- I बैंक के वाणिज्यिक निर्णय, लेनदेन की विश्वसनीयता और करार की शर्तों पर ही विप्रेषण की अनुमति दी जाए।

(iii) समुद्रपारीय आपूर्तिकर्ता के खाते में सीधे विप्रेषण किया जाए।

(iv) प्राधिकृत व्यापारी श्रेणी- I बैंक आयातक कंपनी के मुख्य कार्यपालक अधिकारी अथवा लेखा परीक्षक से आयात के सबूत के रूप में एक प्रमाणपत्र प्राप्त करें कि माल, जिसके लिए विप्रेषण किया गया है, का वास्तव में आयात किया गया है और उसे समुद्रपारीय कार्यालय में संस्थापित किया गया है।

सी.6. आयात बिलों/दस्तावेजों की प्राप्ति

सी.6.1. आयातक द्वारा समुद्रपारीय आपूर्तिकर्ताओं से सीधे आयात दस्तावेजों की प्राप्ति

आयात बिल और दस्तावेज आपूर्तिकर्ता के बैंकर से भारत में आयातक के बैंकर द्वारा प्राप्त किए जाने चाहिए । अत: निम्नलिखित मामलों को छोड़कर, समुद्रपारीय आपूर्तिकर्ता से आयातक द्वारा सीधे आयात बिल प्राप्त करने की स्थिति में प्राधिकृत व्यापारी श्रेणी- I बैंक कोई भी विप्रेषण न करें :-

(i) यदि आयात बिल का मूल्य 300,000 अमरीकी डॉलर से अधिक न हो।

(ii) विदेशी कंपनियों की पूर्ण स्वामित्व वाली भारतीय सहायक कंपनियों द्वारा उनके नियंत्रक कार्यालयों से प्राप्त आयात बिल।

(iii) विदेश व्यापार नीति में यथा परिभाषित स्टेटस होल्डर एक्स्पोर्टर, विशेष आर्थिक क्षेत्र में स्थित 100% निर्यात उन्मुख इकाई/इकाइयों, सरकारी क्षेत्र के उपक्रमों और लिमिटेड कंपनियों द्वारा प्राप्त आयात बिल।

(iv) सभी लिमिटेड कंपनियों अर्थात पब्लिक लिमिटेड, डीम्ड पब्लिक लिमिटेड और प्राइवेट लिमिटेड कंपनियों द्वारा प्राप्त आयात बिल।

सी.6.2. विनिर्दिष्ट क्षेत्रों के मामले में समुद्रपारीय आपूर्तिकर्ताओं से आयातकों द्वारा सीधे आयात दस्तावेजों की प्राप्ति

एक विशेष क्षेत्रगत उपाय के रूप में, जहाँ पर आयातक कच्चे हीरों, कच्चे कीमती रत्नों, कम-महंगे (semi-precious) रत्नों के आयातपत्र (बिल)/दस्तावेज, समुद्रपारीय आपूर्तिकर्ता से सीधे प्राप्त कर लेता है और आयातक द्वारा विप्रेषण के समय दस्तावेजी सबूत प्रस्तुत कर दिये जाते हैं, वहां प्राधिकृत व्यापारी श्रेणी-I बैंकों को अनुमति है कि वे ऐसे आयात के लिए 300,000 अमरीकी डॉलर तक के विप्रेषण की अनुमति दे सकते हैं। प्राधिकृत व्यापारी श्रेणी-I बैंक निम्नलिखित शर्तों पर ऐसे लेनदेन कर सकते हैं।

(i) आयात मौजूदा/प्रचलित विदेश व्यापार नीति के अनुरूप हो ।

(ii) लेनदेन उनके (प्राधिकृत व्यापारी बैंकों) वाणिज्यिक निर्णय पर आधारित हों और वे लेनदेन की वास्तविकता से संतुष्ट हों।

(iii) प्राधिकृत व्यापारी श्रेणी-I बैंक ‘अपने ग्राहक को जानने’ संबंधी मानदण्डों और समुचित सावधानी उपायों/प्रक्रिया का अनुपालन करें और आयातक ग्राहक की वित्तीय स्थिति /मालियत तथा निर्यात वसूली के पिछले रिकार्ड से संतुष्ट हों। सुविधा देने से पहले वे समुद्रपारीय बैंकर अथवा समुद्रपारीय प्रतिष्ठित क्रेडिट रेटिंग एजेंसी से प्रत्येक समुद्रपारीय आपूर्तिकर्ता के बारे में रिपोर्ट प्राप्त करें।

सी.6.3. प्राधिकृत व्यापारी श्रेणी-I बैंक द्वारा समुद्रपारीय आपूर्तिकर्ताओं से सीधे आयात दस्तावेजों की प्राप्ति

(i) आयातक ग्राहकों के अनुरोध पर प्राधिकृत व्यापारी श्रेणी- I बैंक, उल्लेखानुसार समुद्रपारीय आपूर्तिकर्ताओं से सीधे ही बिल प्राप्त कर सकते हैं बशर्ते प्राधिकृत व्यापारी श्रेणी- I बैंक, आयातक ग्राहक की वित्तीय स्थिति / मालियत और पिछले वसूली रिकॉर्ड से पूरी तरह संतुष्ट हों ।

(ii) सुविधा देने से पहले प्राधिकृत व्यापारी श्रेणी- I बैंक, समुद्रपारीय बैंकर अथवा प्रतिष्ठित क्रेडिट रेटिंग एजेंसी से प्रत्येक समुद्रपारीय आपूर्तिकर्ता के बारे में रिपोर्ट प्राप्त करे। तथापि, जहाँ पर इन्वाइस की राशि 300,000 अमरीकी डॉलर से अधिक न हो, समुद्रपारीय आपूर्तिकर्ता के बारे में रिपोर्ट प्राप्त करने की आवश्यकता नहीं है, बशर्ते प्राधिकृत व्यापारी श्रेणी-I बैंक, आयातक ग्राहक के ट्रैक रिकॉर्ड एवं लेनदेन की वास्तविकता से पूरी तरह संतुष्ट हो ।

सी.7. आयात का साक्ष्य

सी .7.1. प्रत्यक्ष आयात

(i) आयात के उन सभी मामलों में, जहां भारत में आयात के लिए भेजी गई/ भुगतान की गई विदेशी मुद्रा की राशि 100,000 अमरीकी डॉलर अथवा उसकी समतुल्य राशि से अधिक है, वहां जिस प्राधिकृत व्यापारी श्रेणी- I बैंक के माध्यम से संबंधित विप्रेषण भेजा गया है, उसकी यह जिम्मेदारी है कि वह यह सुनिश्चित करे कि आयातक निम्नलिखित दस्तावेज प्रस्तुत करता है :-

(ए) घरेलू उपभोग के लिए आयातित सामान हेतु आयातपत्र की विदेशी मुद्रा नियंत्रण प्रतिलिपि; अथवा

(बी) 100% निर्यात उन्मुख इकाई के मामले में, वेयरहाउसों के लिए आयातपत्र की विदेशी मुद्रा नियंत्रण प्रतिलिपि;
अथवा

(सी) डाक द्वारा आयात के मामले में आयातक द्वारा सीमा शुल्क प्राधिकारियों को यथा घोषित सीमा शुल्क निर्धारण प्रमाणपत्र अथवा पोस्टल अप्रेज़ल फॉर्म साक्ष्य के रूप में प्रस्तुत किया जाए जिससे यह सुनिश्चित हो सके कि जिस माल के लिए भुगतान किया गया है, उसका वास्तव में भारत में आयात किया गया है।

(ii) डी/ए आधार पर किए गए आयातों के संबंध में प्राधिकृत व्यापारी श्रेणी-1 बैंक, आयातपत्र के लिए विप्रेषण भेजते समय आयात साक्ष्य प्रस्तुत करने पर जोर दें । तथापि, कंसाइंमेंट का न पहुंचना, कंसाइंमेंट सुपुर्दगी/सीमा शुल्क निकासी में विलंब जैसे जायज़ कारणों से यदि आयातक दस्तावेज़ी साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर पाते हैं, तो आयातक के अनुरोध की मौलिकता (प्रामाणिकता) से संतुष्ट होने पर प्राधिकृत व्यापारी श्रेणी- I बैंक, आयातक को आयात का साक्ष्य प्रस्तुत करने के लिए उचित समय समय दे सकते हैं, किंतु यह अवधि विप्रेषण की तारीख से अधिकतम तीन महीने तक हो सकती है ।

सी .7.2.आयात पत्र (बिल ऑफ एंट्री) के बदले आयात का साक्ष्य

(i) प्राधिकृत व्यापारी श्रेणी-I बैंक, घरेलू उपभोग के लिए आयातित माल के आयातपत्र की विदेशी मुद्रा नियंत्रण प्रतिलिपि के बदले मुख्य कार्यपालक अधिकारी (सीईओ) अथवा कंपनी के लेखा परीक्षक से यह प्रमाणपत्र स्वीकार कर सकते हैं कि माल, जिसके लिए विप्रेषण भेजा गया है, उसका वास्तव में भारत में आयात हो चुका है ; बशर्ते :-

(ए) विप्रेषित विदेशी मुद्रा की राशि 1,000,000 अमरीकी डॉलर (एक मिलियन अमरीकी डालर) अथवा उसके समतुल्य राशि से कम है,

(बी) आयातक कंपनी भारत में स्टॉक एक्स्चेंज में सूचीबद्ध एक कंपनी है और जिसकी शुद्ध मालियत उसकी पिछली लेखा परीक्षित बैलेन्सशीट की तारीख को 100 करोड़ रुपये से कम नहीं है, अथवा आयातक कोई सरकारी क्षेत्र की कंपनी अथवा भारत सरकार का उपक्रम अथवा उसका कोई विभाग है।

(ii) उक्त सुविधा भारतीय विज्ञान संस्थान/ भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, जैसी वैज्ञानिक इकाइयों/ शैक्षणिक संस्थाओं समेत स्वायत्त निकायों को भी दी जाए, जिनके लेखों (अकाउंट) की जांच भारत के नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक (सीएजी) द्वारा की जाती है । प्राधिकृत व्यापारी श्रेणी- I बैंक, ऐसी संस्थाओं के लेखापरीक्षक/सीईओ से इस आशय के घोषणा पत्र क़ी प्रस्तुति पर जोर दें कि नियंत्रक और महालेखापरीक्षक उनके लेखों (अकाउंट) का लेखापरीक्षण करते हैं।

सी .7.3. अगोचर आयात

(i) जहां आयात अगोचर रूप में हो, अर्थात इंटरनेट/ डाटाकॉम चैनेल से सॉफ्टवेयर या डाटा तथा ई-मेल/फैक्स के माध्यम से ड्राइंग व डिज़ाइन हो तो सनदी लेखाकार द्वारा जारी इस आशय का प्रमाणपत्र प्राप्त किया जाए कि आयातक को सॉफ्टवेअर/डाटा/ड्राइंग/ डिज़ाइन प्राप्त हो गये हैं ।

(ii) प्राधिकृत व्यापारी श्रेणी- I बैंक, आयातकों को सूचित करें कि वे इस खण्ड के अंतर्गत किए गए आयातों की जानकारी सीमा शुल्क अधिकारियों को दें।

सी.8. प्राप्ति सूचना जारी करना

प्राधिकृत व्यापारी श्रेणी- I बैंक, आयातक से प्राप्त साक्ष्य अर्थात आयात-पत्र की विदेशी मुद्रा नियंत्रण प्रतिलिपि, पोस्टल अप्रेज़ल फॉर्म अथवा सीमा शुल्क निर्धारण प्रमाणपत्र आदि की पावती पर्ची जारी करें जिसमें आयात लेनदेन से संबंधित सभी संगत ब्योरे दर्ज हों।

सी.9. सत्यापन और परिरक्षण

(i) आंतरिक निरीक्षक अथवा लेखा परीक्षक (प्राधिकृत व्यापारी श्रेणी- I बैंक द्वारा नियुक्त किए गए बाह्य लेखा परीक्षकों समेत) आयात के दस्तावेजी साक्ष्य अर्थात आयात-पत्र की विदेशी मुद्रा नियंत्रण प्रतिलिपियों अथवा पोस्टल अप्रेज़ल फॉर्म अथवा सीमा शुल्क निर्धारण प्रमाणपत्र आदि का सत्यापन करें।

(ii) प्राधिकृत व्यापारी श्रेणी- I बैंक, भारत में आयात के साक्ष्य से संबंधित दस्तावेजों को सत्यापन की तारीख से एक साल की अवधि तक सुरक्षित रखें। तथापि, जिन मामलों में जांच एजेंसियों द्वारा जांच चल रही हो, उनके दस्तावेजों को संबंधित जांच एजेंसी से अनुमति लेने के बाद ही नष्ट किया जाए।

सी.10. आयात साक्ष्य का अनुवर्तन

(i) यदि कोई आयातक 100,000 अमरीकी डॉलर से अधिक के आयात के लिए किए गए विप्रेषणों के संबंध में, भाग III के पैरा सी.7. की अपेक्षानुसार, विप्रेषण की तारीख से तीन महीने के भीतर दस्तावेजी साक्ष्य प्रस्तुत नहीं करता है, तो प्राधिकृत व्यापारी श्रेणी- I बैंक, उस मामले के संबंध में अगले तीन महीने तक आयातक को पंजीकृत पत्र जारी करने समेत तेज़ी से अनुवर्ती कार्रवाई करें।

(ii) प्राधिकृत व्यापारी श्रेणी-I बैंक, 100,000 अमरीकी डॉलर से अधिक के विप्रेषणों के संबंध में, जहां पर आयातक ने उपयुक्त दस्तावेजी आयात साक्ष्य विप्रेषण की तारीख से छह महीने के भीतर प्रस्तुत करने में चूक की है, उनके (आयात लेनदेनों के) ब्योरे देते हुए फार्म बीईएफ में छमाही आधार हर वर्ष जून और दिसंबर के अंत में रिज़र्व बैंक के उस क्षेत्रीय कार्यालय को, जिसके क्षेत्राधिकार में प्राधिकृत व्यापारी श्रेणी- I बैंक कार्य करता हैं, जिससे विवरण संबधित है उस छमाही की समाप्ति के 15 दिनों के भीतर प्रस्तुत करें।

(iii) प्राधिकृत व्यापारी श्रेणी-I बैंकों को 100,000 अमरीकी डालर अथवा इससे कम राशिवाले आयातों के साक्ष्य की प्रस्तुति के संबंध में अनुवर्ती कार्रवाई करने की आवश्यकता नहीं है बशर्ते वे लेनदेन की विश्वसनीयता और प्रेषक की नीयत से संतुष्ट हों । ऐसे मामलों में, कार्रवाई करने के लिए, बैंक का निदेशक मंडल एक उपयुक्त नीति बनाए और प्राधिकृत व्यापारी श्रेणी- I बैंक, तदनुसार अपने लिए आंतरिक दिशा-निर्देश स्वंय निर्धारित करें।

सी.11. बैंक गारंटी जारी करना

प्राधिकृत व्यापारी श्रेणी- I बैंकों को, समय-समय पर यथा संशोधित, 3 मई 2000 की अधिसूचना सं. फेमा 8/2000-आरबी के अनुसार अपने आयातक ग्राहकों की ओर से गारंटी जारी करने की अनुमति है।

सी.12. स्वर्ण का आयात

सी.12.1. नामित बैंकों / एजेंसियों / एंटीटी द्वारा स्वर्ण का आयात

(i) 22 जुलाई 2013 से सभी नामित बैंकों/एजेंसियों/एंटिटीज़ के लिए यह आवश्यक कर दिया गया था कि वे तद्दिनांक एवं उससे आगे यह सुनिश्चित करें कि स्वर्ण के आयात की प्रत्येक खेप (lot) का कम से कम 1/5 भाग (किसी भी स्वरूप एवं शुद्धता में) केवल निर्यात के प्रयोजन हेतु उपलब्ध हो। स्वर्ण के आयात की 20:80 सिद्धांत वाली योजना 28 नवंबर 2014 को वापस ली गई थी। तथापि, 28 नवंबर 2014 से पूर्व आयातित स्वर्ण में से अप्रयुक्त स्वर्ण के संबंध में 20:80 योजना के तहत निर्यात का दायित्व बना रहेगा।

(ii) विदेश व्यापार महानिदेशालय द्वारा अधिसूचित नामित बैंकों तथा नामित एजेंसियों को परेषण (कंसाइनमेंट) के आधार पर स्वर्ण के आयात की अनुमति है। हालांकि, स्वर्ण की समस्त घरेलू बिक्री अग्रिम भुगतान की शर्त के तहत होगी। नामित बैंक स्वर्ण धातु ऋण देने के लिए स्वतंत्र हैं।

(iii) स्टार और प्रीमियर ट्रेडिंग गृह (STH/PTH) दस्तावेज बनाम भुगतान के आधार पर अपनी पात्रता के अनुसार, अंतिम उपयोग संबंधी किसी प्रतिबंध के बिना, स्वर्ण का आयात कर सकते हैं।

(iv) स्वर्ण सिक्कों और पदकों के आयात की अनुमति है। तथापि, बैंको द्वारा स्वर्ण सिक्कों की बिक्री करने पर लगा प्रतिबंध समीक्षाधीन है।

प्राधिकृत व्यापारी श्रेणी–I बैंकों के प्रधान कार्यालय/अंतरराष्ट्रीय बैंकिंग प्रभाग अब से निम्नलिखित विवरण मुख्य महाप्रबंधक, भारतीय रिज़र्व बैंक, विदेशी मुद्रा विभाग, केंद्रीय कार्यालय, व्यापार प्रभाग, अमर भवन, फोर्ट, मुंबई – 400 001 को प्रस्तुत करें। ये विवरण ई-मेल से भी भेजे जाएँ।

(ए) नामित बैंकों/एजेंसियों/रत्न एवं आभूषण क्षेत्र के विशेष आर्थिक क्षेत्रों (SEZs) तथा निर्यातोन्मुख इकाइयों (EoU) द्वारा आयात किए गए स्वर्ण की मात्रा, मूल्य तथा भुगतान के माध्यम आदि को दर्शाते हुए अर्ध-वार्षिक (मार्च/सितंबर की समाप्ति पर) आधार पर विवरण संलग्न-I के अनुसार प्रस्तुत किए जाएं।

(बी) नामित एजेंसियों (नामित बैंकों को छोडकर)/निर्यातोन्मुख इकाइयों/रत्न एवं आभूषण क्षेत्र के विशेष आर्थिक क्षेत्रों (SEZs) द्वारा रिपोर्ट किए जाने वाले माह के दौरान आयात किए गए स्वर्ण की मात्रा और मूल्य दर्शाते हुए मासिक विवरण वित्तीय वर्ष के प्रथम माह से रिपोर्टिंग माह के अंत तक की संचयी दर्शाते हुए विवरण संलग्नक-2 के अनुसार प्रस्तुत किए जाएं।

दोनों विवरण, भले ही स्थिति शून्य हो, संबन्धित माह/अर्धवर्ष की समाप्ति के अनुवर्ती माह की 10 तारीख तक प्रस्तुत किए जाएँ।

सी. 12.2 स्वर्ण आभूषणों का आयात जिसमें कीमती धातुओं अथवा/और हीरे/कीमती रत्नों/कम कीमती रत्नों से जड़ित आभूषण शामिल हैं

किसी भी रूप में स्वर्ण के आयात के लिए खोले गए साख पत्र की मियादी अवधि सहित आपूर्तिकर्ता और क्रेता ऋण (व्यापार ऋण), जिसमें स्वर्ण/कीमती धातुओं से बने हुए अथवा/और हीरे/कम कीमती रत्नों/कीमती रत्नों से जड़ित आभूषण शामिल हैं, की अवधि पोतलदान की तारीख से 90 दिनों से अधिक नहीं होगी।

सी. 13 अन्य कीमती धातुओं का आयात

सी. 13.1 प्लैटिनम/पलाडियम/रोडियम/चांदी/कच्चे, कट और पालिश किए हुए हीरों/कीमती और कम कीमती रत्नों का आयात

(ए) प्लैटिनम/पलाडियम/रोडियम और चांदी तथा कच्चे, कट और पालिश किए हुए हीरों, कीमती और कम कीमती रत्नों के आयात के लिए खोले गए साखपत्र की मियादी अवधि सहित आपूर्तिकर्ता और क्रेता ऋण की अवधि पोतलदान की तारीख से 90 दिनों से अधिक नहीं होगी। हालांकि, "बेजमानती ऋण अर्थात किसी विदेशी आपूर्तिकर्ता द्वारा उसके भारतीय ग्राहक/क्रेता को बिना साखपत्र (आपूर्तिकर्ता ऋण)/वचन-पत्र (क्रेता ऋण)/भारतीय वित्तीय संस्था द्वारा रखी गई सावधि जमा के बिना कच्चे, कट और पालिश किए हुए हीरों के आयात के लिए अनुमति पोत लदान की तारीख से 180 दिनों से अनधिक अवधि के लिए दी जा सकती है।

(बी) धातुओं और कच्चे, कट तथा पालिश किए हुए हीरों का आयात करते समय समुचित सावधानी बरतने और रिज़र्व बैंक द्वारा जारी अपने ग्राहक को जानने संबंधी मानदंडों एवं धन शोधन निवारण दिशानिर्देशों का प्राधिकृत व्यापारी श्रेणी–I बैंक अनुपालन सुनिश्चित करें। इसके अलावा, कारोबार की मात्रा में किसी बड़ी और असामान्य वृद्धि की बारीकी से जांच की जाए ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि किए गए लेनदेन सदाशयतापूर्ण हैं और वे ब्याज/मुद्रा संबंधी अंतरपणन के अभिप्राय से नहीं किए गए हैं।

सी. 13.2 अनिर्धारित (अनियत) कीमत के आधार पर प्लैटिनम/चांदी आयात

नामित एजेंसी/बैंक एकमुश्त खरीद के आधार पर प्लैटिनम और चाँदी का आयात कर सकते हैं बशर्ते यह कि, यद्यपि आयात के समय ही उनका स्वामित्व आयातक को दे दिया जाएगा, परन्तु उनकी कीमत बाद में तब निर्धारित की जाएगी जब आयातक उसे उपयोगकर्ताओं को बेचेगा, किन्तु यह प्रकिया उस अवधि के भीतर संपन्न होनी चाहिए जिसमें लेनदेन का भुगतान (निपटान) किया जाना हो।

सी. 14. आयात लेनदारी (फैक्टरिंग)

  1. प्राधिकृत व्यापारी श्रेणी-I बैंक, रिज़र्व बैंक के अनुमोदन के बिना, अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त फैक्टरिंग कंपनियों, अधिमानतः फैक्टर्स चेन इंटरनेशनल के सदस्य के साथ, आयात लेनदारी (फैक्टरिंग) की व्यवस्था कर सकते हैं।

  2. उन्हें आयात से संबंधित मौजूदा विदेशी मुद्रा निर्देशों, प्रचलित व्यापार नीति और रिज़र्व बैंक द्वारा इस बारे में जारी किसी अन्य दिशानिर्देश/निदेशों का अनुपालन सुनिश्चित करना होगा।

सी. 15 मर्चेंटिंग ट्रेड

सी. 15.1 किसी ट्रेड को मर्चेंटिंग ट्रेड के रूप में तभी वर्गीकृत किया जा सकता है जब वह निम्नलिखित शर्तें पूरी करता हो:

ए. अर्जित माल ने घरेलू प्रशुल्क क्षेत्र में प्रवेश न किया हो; और

बी. माल के स्वरूप में कोई परिवर्तन न हुआ हो।

सी. 15.2 प्राधिकृत व्यापारी श्रेणी-I बैंक सदाशयतापूर्ण मर्चेंटिंग ट्रेड संबंधी लेनदेनों को प्रबंधित कर सकते हैं और वे यह सुनिश्चित करें कि :

(ए) भारत में लागू (प्रचलित) विदेश व्यापार नीति के अंतर्गत पोत लदान की तारीख को लेनदेनों से संबधित माल भारत में निर्यात/आयात के लिए अनुमत है और निर्यात खंड और आयात खंड के लिए क्रमश: निर्यात (घोषणा फार्म के सिवाय) और आयात (आयात पत्र के सिवाय) के लिए लागू सभी नियमों, विनियमों और निदेशों का अनुपालन किया गया है।

(बी) मर्चेंटिंग ट्रेड लेनदेन के दोनों लेग एक ही प्राधिकृत व्यापारी बैंक के मार्फत पूरे किए गए हैं। बैंक को इनवाइस, पैकिंग लिस्ट, ट्रांस्पोर्ट दस्तावेज और बीमा दस्तावेज {यदि मूल दस्तावेज उपलब्ध न हों तो दस्तावेजों को भेजने/प्राप्त करने वाले बैंक द्वारा विधिवत प्रमाणित अपरक्राम्य (not negotiable) प्रतियां प्राप्त की जाएं} परखने (verify करने) चाहिए और ट्रेड की मौलिकता (genuineness) के प्रति संतुष्ट हो लेना चाहिए।

(सी) मर्चेंटिंग ट्रेड लेनदेन संबंधी समग्र प्रक्रिया नौ माह में पूरी होनी चाहिए और उसके लिए विदेशी मुद्रा परिव्यय (outlay) चार माह से अधिक अवधि के लिए नहीं होना चाहिए;

(डी) मर्चेंटिंग ट्रेड का प्रारंभ पोत लदान/निर्यात लेग रसीद अथवा आयात लेग भुगतान की तारीख में से जो भी पहले की तारीख हो से माना जाएगा। इसके पूरे होने की तारीख वह होगी जो पोत लदान/निर्यात लेग रसीद अथवा आयात लेग भुगतान की तारीख में से अंतिम तारीख होगी;

(ई) अल्पावधि क्रेडिट या तो आपूर्तिकर्ता की क्रेडिट अथवा क्रेता की क्रेडिट मर्चेंटिंग ट्रेड लेनदेनों के लिए उस सीमा तक उपलब्ध होगी जो निर्यात लेग के लिए अग्रिम विप्रेषण द्वारा समर्थित न हो, इसमें, आयात लेनदेनों की भांति, प्राधिकृत व्यापारी बैंक द्वारा निर्यात लेग के लिए एलसी की डिस्काउंटिंग शामिल है;

(एफ़) यदि मर्चेंटिंग ट्रेडर को निर्यात लेग के लिए अग्रिम प्राप्त हो तो प्राधिकृत व्यापारी बैंक को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि उसे संबंधित आयात लेग के भुगतान के लिए चिह्नित किया जाए। हालांकि, प्राधिकृत व्यापारी बैंक ऐसी निधियों को अंतर अवधि हेतु ब्याज सहित खाते (के रूप) में अल्पावधि के लिए नियोजित करने की अनुमति दे सकता है;

(जी) समुद्रपारीय बिक्रेता द्वारा मांग किए जाने पर आयात लेग के लिए अग्रिम भुगतान की अनुमति मर्चेंटिंग ट्रेडर को दी जा सकती है। ऐसे मामलों में जहां समुद्रपारीय क्रेता से आवक विप्रेषण प्राप्त होने से पहले समुद्रपारीय आपूर्तिकर्ता को जावक विप्रेषण करना पड़े, वहां प्राधिकृत व्यापारी बैंक ऐसे लेनदेन की सुविधा अपने वाणिज्यिक निर्णय के आधार पर दे सकते हैं। हालांकि, इस संबंध में यह सुनिश्चित करना चाहिए कि केवल उन मामलों एवं सीमाओं को छोड़कर जहां निर्यात लेग के लिए भुगतान पहले ही मिल चुका हो, 2,00,000 अमरीकी डालर से अधिक के आयात लेग के लिए अग्रिम भुगतान बैंक गारंटी/अंतर्राष्ट्रीय प्रतिष्ठित बैंक के साख पत्र पर दिए जाएं;

(एच) परिव्यय तथा नौ माह में लेनदेन पूरे होने की बात को ध्यान में रखते हुए, पक्के निर्यात आदेशों पर आपूर्तिकर्ता को साख पत्र की अनुमति दी जाती है;

(आई) मर्चेंट ट्रेडर के विदेशी मुद्रा अर्जक विदेशी मुद्रा खाते (EEFC) में जमा शेष से आयात लेग के लिए भुगतान करने की भी अनुमति दी जा सकती है;

(जे) प्राधिकृत व्यापारी बैंक प्रत्येक मर्चेंटिंग ट्रेड लेनदेन के मामले में एक लेग की उसी प्रति लेग से मैचिंग (one to one matching) सुनिश्चित करे और ट्रेडर द्वारा किसी लेग में की गई चूक को संबंधित अर्ध वर्ष अर्थात जून और दिसंबर की समाप्ति से 15 दिनों के भीतर संलग्न-3 में भारतीय रिज़र्व बैंक के संबंधित क्षेत्रीय कार्यालय को रिपोर्ट करे;

(के) उन चूककर्ता मर्चेंटिंग ट्रेडरों के नाम सचेतक सूची में डाले जाएंगे, जहां बकाया उनके वार्षिक निर्यात की आय के 5% को छू लेगी।

(एल) इस प्रकार के लेनदेनों को (handle) करते समय प्राधिकृत व्यापारी बैंक ‘अपने ग्राहक को जानने (KYC)’ एवं ए.एम.एल. (AML) संबंधी दिशा-निर्देशों का पालन करें।

मर्चेंटिंग ट्रेडर माल का मौलिक (वास्तविक) ट्रेडर होना चाहिए, न कि केवल वित्तीय बिचौलिया। उसे ओवरसीज़ क्रेता से पक्के आर्डर प्राप्त होने चाहिए। प्राप्त आर्डर के तहत दायित्व को पूरा करने के संबंध में मर्चेंटिंग ट्रेडर की क्षमता के प्रति प्राधिकृत व्यापारी बैंक को स्वयं संतुष्ट हो लेना चाहिए। समग्र मर्चेंटिंग ट्रेड से मर्चेंटिंग ट्रेडर को समुचित लाभ होना चाहिए।

सी. 15.3 नेपाल और भूटान के साथ मर्चेंटिंग ट्रेड

चूंकि नेपाल और भूटान बन्दरगाह विहीन देश हैं, इसलिए उन्हें मार्गस्थ ट्रेड की सुविधा है जिसके द्वारा नेपाल और भूटान अन्य देशों से माल का आयात भारत के मार्फत, भारत सरकार के साथ इन दोनों देशों के साथ हुए मार्गस्थ समझौते के तहत, सीमाशुल्क मार्गस्थ घोषणापत्र के जरिए करते हैं। भारत सरकार के परामर्श से यह स्पष्ट किया जाता है कि भारत के मार्फत मर्चेटिंग ट्रेड के अंतर्गत नेपाल और भूटान के आयातकों को अन्य देशों द्वारा परेषित (consigned) माल को मार्गस्थ माल (traffic-in-transit) समझा जाएगा, बशर्ते ऐसा माल क्रमशः भारत-नेपाल मार्गस्थ समझौते और भारत-भूटान मार्गस्थ समझौतों के उपबंधों/शर्तों के अनुरूप हो।


परिशिष्ट

माल और सेवाओं के आयात संबंधी जारी परिपत्रों की समेकितसूची

क्रम परिपत्र संख्या दिनांक
1. एपी (डीआइआर सिरीज) परिपत्र सं. 106 19 जून 2003
2. एपी (डीआइआर सिरीज) परिपत्र सं. 4 19 जुलाई 2003
3. एपी (डीआइआर सिरीज) परिपत्र सं.9 18 अगस्त 2003
4. एपी (डीआइआर सिरीज) परिपत्र सं.15 17 सितंबर 2003
5. एपी (डीआइआर सिरीज) परिपत्र सं.49 15 दिसंबर 2003
6. एपी (डीआइआर सिरीज) परिपत्र सं.66 6 फरवरी 2004
7. एपी (डीआइआर सिरीज) परिपत्र सं.72 20 फरवरी 2004
8. एपी (डीआइआर सिरीज) परिपत्र सं.2 9 जुलाई 2004
9. एपी (डीआइआर सिरीज) परिपत्र सं.34 18 फरवरी 2005
10. एपी (डीआइआर सिरीज) परिपत्र सं.1 12 जुलाई 2005
11. एपी (डीआइआर सिरीज) परिपत्र सं.33 28 फरवरी 2007
12. एपी (डीआइआर सिरीज) परिपत्र सं.34 2 मार्च 2007
13. एपी (डीआइआर सिरीज) परिपत्र सं.63 25 मई 2007
14. एपी (डीआइआर सिरीज) परिपत्र सं.77 29 जून 2007
15. एपी (डीआइआर सिरीज) परिपत्र सं.18 7 नवंबर 2007
16. एपी (डीआइआर सिरीज) परिपत्र सं.37 16 अप्रैल 2008
17. एपी (डीआइआर सिरीज) परिपत्र सं.03 4 अगस्त 2008
18. एपी (डीआइआर सिरीज) परिपत्र सं.08 21 अगस्त 2008
19. एपी (डीआइआर सिरीज) परिपत्र सं.09 21 अगस्त 2008
20. एपी (डीआइआर सिरीज) परिपत्र सं.12 28 अगस्त 2008
21. एपी (डीआइआर सिरीज) परिपत्र सं.13 1 सितंबर 2008
22. एपी (डीआइआर सिरीज) परिपत्र सं.15 8 सितंबर 2008
23. एपी (डीआइआर सिरीज) परिपत्र सं.21 29 दिसंबर 2009
24. एपी (डीआइआर सिरीज) परिपत्र सं.56 29 अप्रैल 2011
25. एपी (डीआइआर सिरीज) परिपत्र सं.59 06 मई 2011
26. एपी (डीआइआर सिरीज) परिपत्र सं.82 21 फरवरी 2012
27. एपी (डीआइआर सिरीज) परिपत्र सं.83 27 फरवरी 2012
28. एपी (डीआइआर सिरीज) परिपत्र सं.103 03 अप्रैल 2012
29. एपी (डीआइआर सिरीज) परिपत्र सं.83 20 फरवरी 2013
30. एपी (डीआइआर सिरीज) परिपत्र सं.103 13 मई 2013
31. एपी (डीआइआर सिरीज) परिपत्र सं.107 04 जून 2013
32. एपी (डीआइआर सिरीज) परिपत्र सं.122 27 जून 2013
33. एपी (डीआइआर सिरीज) परिपत्र सं.15 22 जुलाई 2013
34. एपी (डीआइआर सिरीज) परिपत्र सं.39 6 सितंबर 2013
35. एपी (डीआइआर सिरीज) परिपत्र सं.70 8 नवंबर 2013
36. एपी (डीआइआर सिरीज) परिपत्र सं.71 8 नवंबर 2013
37. एपी (डीआइआर सिरीज) परिपत्र सं.73 11 नवंबर 2013
38. एपी (डीआइआर सिरीज) परिपत्र सं.75 19 नवंबर 2013
39. एपी (डीआइआर सिरीज) परिपत्र सं.82 31 दिसंबर 2013
40. एपी (डीआइआर सिरीज) परिपत्र सं.95 17 जनवरी 2013
41. एपी (डीआइआर सिरीज) परिपत्र सं.100 4 फरवरी 2014
42. एपी (डीआइआर सिरीज) परिपत्र सं.103 14 फरवरी 2014
43. एपी (डीआइआर सिरीज) परिपत्र सं.115 28 मार्च 2014
44. एपी (डीआइआर सिरीज) परिपत्र सं.116 1 अप्रैल 2014
45. एपी (डीआइआर सिरीज) परिपत्र सं.122 10 अप्रैल 2014
46. एपी (डीआइआर सिरीज) परिपत्र सं.133 21 मई 2014
47. एपी (डीआइआर सिरीज) परिपत्र सं.146 19 जून 2014
48. एपी (डीआइआर सिरीज) परिपत्र सं. 2 7 जुलाई 2014
49. एपी (डीआइआर सिरीज) परिपत्र सं. 42 28 नवंबर 2014
50. एपी (डीआइआर सिरीज) परिपत्र सं. 76 12 फरवरी 2015
51. एपी (डीआइआर सिरीज) परिपत्र सं. 79 18 फरवरी 2015
52. एपी (डीआइआर सिरीज) परिपत्र सं. 96 30 अप्रैल 2015
 
 
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