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भारतीय रिज़र्व बैंक की 80वीं वर्षगांठ
(2 अप्रैल 2015 को वित्तीय समावेशन सम्मेलन में भारतीय रिज़र्व बैंक के गवर्नर डॉ. रघुराम जी. राजन का उद्घाटन भाषण)

आदरणीय प्रधान मंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी, महाराष्ट्र गवर्नर श्री विद्यासाग्गर जी, वित्त मंत्री श्री अरुण जैटली जी, मुख्य मंत्री श्री देवेंद्र फड़नवीस, अन्य विशिष्ट अतिथिगण, मेरे आरबीआई के साथियों, देवियों और सज्जनों।

आज भारतीय रिज़र्व बैंक ने अस्सी वर्ष पूरे कर लिए हैं। आदमी के जीवन में अस्सी वर्ष काफी लंबा समय होता है। दक्षिण भारत में अस्सी वर्ष पूरे करने पर सदाभिषेकम नाम से एक समारोह मनाया जाता है। तो एक तरह से आज हम भारतीय रिज़र्व बैंक का सदाभिषेकम मना रहे हैं। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है की अब रिजर्व बैंक की जिम्मेदारियाँ समाप्त हो गई हैं, आज तो केवल हमारे सफर की शुरुआत की समाप्ति है।

रिज़र्व बैंक की स्थापना 1935 में हुई थी जब भारत अंग्रेजी शासन के अधीन था। किंतु भारतीय रिज़र्व बैंक निश्चित रूप से ही कोई ब्रिटिश संस्था नहीं है और यह संस्था शुरू से ही भारत के आर्थिक हितों के लिए कार्य कर रहा है।

रिज़र्व बैंक ने भारतीय प्रतिभा का भी पोषण किया है। 1943 में चिंतामण द्वारकानाथ देशमुख को रिज़र्व बैंक के पहले भारतीय गवर्नर के रूप में नियुक्त किया गया था, वे वित्तीय क्षेत्र में भारत के एक बहुत ही अच्छे जाने-माने व्यक्ति थे। उन्होंने जिन समस्याओं का सामना किया था उनमें से एक यह समस्या थी कि दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान अंग्रेजी शासन के कारण भारत पर कर्ज का जो बोझ बन गया था उससे किस प्रकार सम्मानपूर्वक और अटल इरादे से निपटा जाए।

पिछले वर्षों के दौरान रिज़र्व बैंक को बहुत से महान लोगों का नेतृत्व प्राप्त हुआ है जो इस बात का प्रतीक है कि सरकार भी एक सुदृढ़ केंद्रीय बैंक स्थापित करने को कितना महत्व देती है। पिछले गवर्नरों और उप गवर्नरों की सूची को भारतीय आर्थिक व्यवस्था में सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति की सूची रही है जिसमें बेनेगल रामा राव, एम. नरसिंहम, डॉ. आई.जी. पटेल, डॉ. मनमोहन सिंह, डॉ. रंगराजन, डॉ. बिमल जालान, डॉ. वाई.वी. रेड्डी और डॉ. सुब्बाराव शामिल हैं जिन्हें एस.एस. तारापोर, वेपा कामेसन, डॉ. राकेश मोहन, श्यामला गोपीनाथ और उषा थोरात जैसे उप गवर्नरों द्वारा शानदार योगदान दिया गया। भारतीय रिज़र्व बैंक का बोर्ड भी बेहतरीन रहा जिसमें सर पुरूषोतमदास ठाकुरदास और येज़दी मालेगाम जैसी हस्तियों ने मार्गदर्शन किया।

बड़ी ही रोचक बात है कि बहुत से गवर्नर प्रशासनिक सेवा से रहे, इनमें से केवल एम. नरसिंहम ही भारतीय रिज़र्व बैंक से थे। फिर भी, सभी गवर्नरों का मानना था कि रिज़र्व बैंक का कार्य देश के वित्तीय विकास के लिए कार्य करते हुए इसकी मौद्रिक और वित्तीय स्थिरता की रक्षा करना है। सरकार और बैंक के बीच, उनके अपने-अपने दृष्टिकोण और जोखिम के प्रति नजरिए को ध्यान में रखते हुए, हमेशा से एक रचनात्मक संवाद होता रहा है। इतिहास इस बात का गवाह है कि हर एक सरकार ने सर्वदा भारतीय रिज़र्व बैंक के विवेकपूर्ण परामर्श की सराहना की है।

पिछले वर्षों में रिज़र्व बैंक ने कई मुद्दों का समाधान किया है। मुद्रास्फीति नियंत्रण इनमें से सर्वश्रेष्ठ कार्य रहा है और रिज़र्व बैंक ने खाने-पीने की चीजों में कमी, तेल की कीमतों और युद्धों से उत्पन्न हुए मूल्य दबाव के बावजूद भी इस समय में सराहनीय कार्य किया है।

वित्तीय क्षेत्र का विकास दूसरा मुद्दा रहा है। भारतीय रिज़र्व बैंक की भूमिका नई संस्थाएं स्थापित करने, प्रौद्योगिकी के उपयोग को बढ़ावा देने, बाजारों को विकसित करने और वित्तीय समावेशन का विस्तार करने में रही है।

आने वाले वर्ष में बैंकिंग जगत में कई नए बैंक होंगे जैसे भुगतान बैंक, लघु वित्त बैंक और संभवतः डाक बैंक जो मौजूदा सार्वभौमिक बैंकों, क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों, सहकारी बैंकों और विविध प्रकार की गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों से मुकाबला करेंगे।

प्रौद्योगिकी का उपयोग भी उन दिनों की तुलना में काफी बढ़ गया है जब खाते हाथ से बहियों में दर्ज किए जाते थे और यूनियनें कंप्यूटर शब्द के प्रयोग मात्र से ही हड़ताल करने लगती थी। आज हालत यह है कि कुछ बैंकों ने अपने ग्राहकों को मोबाइल फोन पर ही अपने सारे बैंकिंग लेनदेन करने की अनुमति दे दी है, अब शाखा में प्रवेश किए बिना और कलम से कुछ लिखे बिना ही सारा काम हो जाता है।

हमारा उद्देश्य स्वामित्व और संस्था न्यूट्रल, टेक्नोलॉजी में बिना कोई भेदभाव किए प्रतिस्पर्धी क्षेत्र तैयार करना है। उदाहरण के तौर पर, जैसे-जैसे बैंक सूचना प्राप्त करने और उसका विश्लेषण करने तथा लेनदेन लागत कम करने पर ध्यान केंद्रित करेंगे, टेक्नोलॉजी समर्थित टच-एंड-गो भुगतान प्रणाली प्रयोग में आएगी ताकि वित्तीय सेवाओं का विस्तार सभी लोगों तक हो सके। भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा विकसित सबसे आधुनिक भुगतान प्रणाली में प्रौद्योगिकी का सहयोग प्राप्त होगा जैसे ही रिज़र्व बैंक अपने साइबर पर्यवेक्षण और साइबर सुरक्षा को मजबूत बना लेगा।

हमें उन जोखिमों के प्रभाव को कम करने के लिए ऐसे गहन बाजारों की आवश्यकता है जो जोखिम प्रायः बैंकों या निगमों में बने हुए हैं। इस मामले में भी हमारा ट्रैक रिकार्ड बहुत अच्छा रहा है। यद्यपि कई विकासशील देशों की सरकारें विदेशी मुद्रा में उधार लेने के लिए मजबूर हैं, रिज़र्व बैंक ने एक रुपया आधारित चलनिधि युक्त सरकारी बांड बाजार विकसित किया है जिसमें सरकार आज 40 वर्षीय बांड जारी करने में सक्षम है। वास्तव में रुपया अंतरराष्ट्रीय रूप ले रहा है क्योंकि विदेशी संस्थाएं रुपया मूल्यवर्गांकित बांड जारी करने की कतार में खड़ी हैं। भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा प्रोत्साहित नए उत्पाद जैसे हाल ही में शुरू किया गया ब्याज दर फ्यूचर्स संविदाएं (इंटरेस्ट रेट फ्यूचर्स कान्ट्रैक्ट) मुद्रा विनिमय बाजारों में काफी अच्छा कारोबार कर रहे हैं।

हमारा कार्य यही पर समाप्त नहीं हो गया है। देश की बुनियादी सुविधा के क्षेत्र में बहुत भारी वित्तपोषण की जरूरत है और हमारे बैंकों पर पहले से ही काफी अधिक एक्सपोज़र है। बड़ी कॉर्पोरेट संस्थाओं ने भी बहुत अधिक ऋण ले रखा है। बुनियादी सुविधा के क्षेत्र का वित्तपोषण करने पर जोर देते हुए वित्तीय स्थिरता को नज़रअंदाज नहीं किया जाना चाहिए क्योंकि वित्तीय स्थिरता राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए सबसे महत्वपूर्ण है। आगे चलकर, हमें जोखिम पूंजी (रिस्क कैपिटल) के नए स्रोत विकसित करने की आवश्यकता है ताकि हमारी बुनियादी आवश्यकताओं का वित्तपोषण संतुलित (मोड्रेट) लीवरेज़ से किया जा सके और हम इस प्रणाली को डिलीवरेज़ करने में मदद कर सकें।

शायद राष्ट्र की सबसे महत्वपूर्ण चुनौती, जो आज इस सम्मेलन का विषय भी है, वह वित्तीय सेवाओं को प्रत्येक व्यक्ति के दरवाजे और प्रत्येक लघु उद्यम तक पहुंचाना है। अभी भी गरीब आदमी इनसे काफी दूर हैं या बैंक शाखाओं में जाने में वे असहज महसूस करते हैं।

प्रधानमंत्री जन धन योजना और मुद्रा बैंक जैसी सरकारी पहलों के साथ-साथ नई टेक्नोलॉजी, नई संस्थाओं और सीधे लाभ अंतरण जैसी नई प्रक्रियाओं से मुझे पूरा यकीन है कि हमारा देश गरीब और छोटे लोगों को विकल्प और अवसर दोनों उपलब्ध कराते हुए उन्हें समर्थ बना सकता है।

अंततः यदि रिज़र्व बैंक का आज सम्मान किया जा रहा है तो यह उन हजारों लोगों के कारण हुआ है जिन्होंने वर्षों से क्षमता और समर्पण के साथ बैंक के लिए कार्य किया है। मैं दो लोगों की बात करता हूं। भोपाल कार्यालय की उप महाप्रबंधक रानी दुर्वे ने फर्जी ईमेल और अधिक ब्याज दर जैसे विषयों पर कई फिल्में, पुस्तकें और नुक्कड़ नाटक तैयार किए हैं ताकि आमजनता को शिक्षित और सावधान किया जा सके। सूचना प्रौद्योगिकी विभाग के निर्मल पटनायक, सहायक महाप्रबंधक ने राष्ट्रीय इलेक्ट्रॉनिक भुगतान प्रणालियों के माध्यम से सरकारी विभागों के लिए निधियों का अखिल भारतीय इलेक्ट्रॉनिक अंतरण संभव बनाया और इस प्रकार एक ही दिन में सरकार को इन इलेक्ट्रॉनिक भुगतान प्रणालियों का एक महत्वपूर्ण उपयोगकर्ता बनाया। दोनों ने सामान्य ड्यूटी से परे कार्य किया है किंतु वे बैंक में दूसरे बहुत से लोगों के लिए प्रदर्शक हैं।

भारतीय रिज़र्व बैंक का इसकी सत्यनिष्ठा के लिए भी सम्मान किया जाता है। आज मेरे लिए एक बड़े गर्व की बात है कि जब कोई व्यक्ति किसी विनियम (रेग्यूलेशन) में बदलाव करने के लिए बात करने के लिए हमारे भवन में प्रवेश करता है तो वह पैसे के साथ यहां नहीं आता बल्कि इस तर्क के साथ आता है कि इसके लिए सही क्या है।

अब मैं अपनी बात को समाप्त करता हूं। मजबूत राष्ट्रीय संस्था का निर्माण करना कठिन कार्य है। इसलिए मौजूदा संस्थाओं को बाहर से विकसित किया जाना चाहिए और अंदर से उनका नवीकरण किया जाना चाहिए क्योंकि उत्कृष्ट संस्थाएं बहुत ही कम हैं। हम इस महान संस्था के 81वें वर्ष में इसके प्रति पुनःसमर्पित होते हैं ताकि सभी लोगों की समृद्धि और उनके लिए आर्थिक अवसर प्राप्त करने में राष्ट्र की सहायता कर सके। इस समारोह में शामिल होने के लिए आप सभी को धन्यवाद।

 
 
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